प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Saturday, 7 March 2026

उनकी निगाहों के साए


 
हर पल देखते हैं उनकी निगाहों के साए,
मुझे चूमते हैं उनकी निगाहों के साए।

ऐसे पल भी आए हैं हैरान जिंदगी में,
मुझे चुभते हैं उनकी निगाहों के साए।

कड़ी धूप में जब झुलझ गए हम,
याद आए तब उनकी निगाहों के साए।

ये प्यास कैसी,ये तमन्ना क्यूँ हैं उभरी,
मुझे समेट लें उनकी निगाहों के साए।

धड़कता ये दिल इतनी घब्राहट क्यों है,
छिन न ले कोई उनकी की निगाहों के साए।

शनिवार, ७/२/२६ , १२:१० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

“जनाब जाँ निसार अख्तर की ग़ज़ल ‘उनकी निगाहों के साए’ से मुतास्सिर।”
फिल्म: प्रेम परबत

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