हर पल देखते हैं उनकी निगाहों के साए,
मुझे चूमते हैं उनकी निगाहों के साए।
ऐसे पल भी आए हैं हैरान जिंदगी में,
मुझे चुभते हैं उनकी निगाहों के साए।
कड़ी धूप में जब झुलझ गए हम,
याद आए तब उनकी निगाहों के साए।
ये प्यास कैसी,ये तमन्ना क्यूँ हैं उभरी,
मुझे समेट लें उनकी निगाहों के साए।
धड़कता ये दिल इतनी घब्राहट क्यों है,
छिन न ले कोई उनकी की निगाहों के साए।
शनिवार, ७/२/२६ , १२:१० PM
अजय सरदेसाई -मेघ
“जनाब जाँ निसार अख्तर की ग़ज़ल ‘उनकी निगाहों के साए’ से मुतास्सिर।”
फिल्म: प्रेम परबत

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