(मतला)
गर हमसे पूछो के हम और क्या रखते हैं,
ओठों पे सुख़न और हाथ में कलम रखते हैं।
ओठों पे सुख़न और हाथ में कलम रखते हैं।
दिदार-ए-रक़ीब जब भी होते हैं,
धड़कनों के साथ दिल में ग़म रखते हैं।
हो सकता है तेरी चाहत—इसे मेरा एक भरम समझे,
हम सर-आँखों पर तेरा हर सितम रखते हैं।
तेरी वहशत का सिलसिला थमता ही नहीं, सितमगर,
जीने के लिए फिर थोड़ा सा वहम रखते हैं।
ये इश्क़ भी अजीब है, हिसाब नहीं मानता,
हम तेरे नाम पर हर रोज़ नया करम रखते हैं।
(मकता)
‘मेघ’—इतना भी आसान नहीं दिल को समझाना,
इन धड़कनों में छुपाकर कई आलम रखते हैं।
बुधवार, २५/३/२६ , ७:३० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

No comments:
Post a Comment