प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Friday, 4 September 2026

गोकुळीचा काला



दुध-दह्याची धार मिसळली यमुनेत आज,
मुखी मधुर शर्करा-नवनीत गोळा।
देवकीनंदन गोपाळा, तो गोकुळीचा ग्वाला,
सोबत्यांसी घेऊनी करतो गोकुळी काला॥

गोपाळांच्या संगती खेळे यशोदेचा गोपाळ,
हास्य-विनोदांनी दुमदुमला सारा गोकुळ।
कुणी आणिले दही, कुणी लोण्याचा गोळा,
प्रेमानंदे रंगला सारा हा न्यारा गोकुळीचा मेळा॥

गोविंदा रे गोपाळा, नंदाचा तू बाळा,
तुझ्या नामघोषाने पावन हा सुख सोहळा।
दही-दुधाच्या धारेत भक्तिभाव ओथंबला,
कृष्णनामाने जीव आनंदे न्हाऊन निघाला॥

नंदाघरी, यशोदेच्या अंगणी आज आनंदाची उधळण,
कान्हाच्या मुखी दिसे चंद्राची कोवळी किरण।
मुरलीच्या स्वरांनी मोहित गोकुळजन,
हरिनामाच्या गजरात नाचे सकळ वृंदावन॥

गोविंदा रे गोपाळा, नंदाचा तू बाळा,
तुझ्या नामघोषाने पावन हा सुख सोहळा।
दही-दुधाच्या धारेत भक्तिभाव ओथंबला,
कृष्णनामाने जीव आनंदे न्हाऊन निघाला॥

काला हा केवळ दही-दुधाचा नाही,
प्रेमानंदाची ही मेजवानी, दुसरी उपमा नाही।
एकत्र येती सारे, भेदभाव विसरती,
कृष्णाच्या गळ्यात अंतरीची प्रेम अर्पिती॥

गोविंदा रे गोपाळा, नंदाचा तू बाळा,
तुझ्या नामघोषाने पावन हा सुख सोहळा।
दही-दुधाच्या धारेत भक्तिभाव ओथंबला,
कृष्णनामाने जीव आनंदे न्हाऊन निघाला॥

गोकुळीचा काला... गोकुळीचा काला...
हरि गोविंदा... गोपाळा...

शनिवार, ५/९/२६ , ११:५० AM
अजय सरदेसाई -मेघ 

वेगळी वाट



वाळूचे कण, करोडों, तरी वेगळे,
काळाचे क्षण, अब्जों, तरी वेगळे।
एकाच सागरातील लाटा साऱ्या,
तरी किनारी उमटती ठसे वेगळे॥

आभाळातील तारे, अगणित जरी,
ओळख त्यांची आभाळापल्याड नाही।
फुलबागेत रंग हजारो फुलांचे,
बागेतच त्या हजारो फुलांची राई॥

माणसेही अशीच, गर्दीत असंख्य,
प्रत्येकाच्या मनात कहाणी वेगळी।
माणसं तीच जरी, माणुसकी वेगळी,
माणसामाणसांतील दुनिया वेगळी॥

क्षणाक्षणांनी सरत जातो हा काळ,
तरी आठवणींची प्रत्येक सावली वेगळी।
जीवन एकच जरी, धरा एकच सारी,
तरी प्रत्येकाची जगण्याची वाट वेगळी॥

शुक्रवार, ४/९/२६, ५:४५ PM
अजय सरदेसाई — मेघ

Tuesday, 1 September 2026

कविता


लेखणीत माझ्या शाई असावी,
लेखणीतून सुंदर कविता रिझावी।
कविता एका सुंदर मुलीने वाचावी,
आणि गोड गळ्याने तिने ती गावी॥


शब्दांमध्ये माझ्या भाव असावा,
प्रत्येक ओळींत प्रेमाचा गाव असावा।
ओठांवर तिच्या हळूच हास्य फुलावे,
हास्यात त्या मन माझे विरघळून जावे॥


कवितेचा अर्थ तिने अलगद उलगडावा,
ओळखून अर्थ गालावर लालिमा पसरावा।
स्वर तिचा माझ्या हृदयात दरवळावा,
तेव्हा माझा प्रत्येक शब्द धन्य व्हावा॥


मंगळवार, १/९/२६ , १०:५६ PM

अजय सरदेसाई -मेघ

कळत नाही... !



काही बोलायाचे आहे, काय बोलू कळत नाही,
नदीस नागमोडी वळणे, पण का? कळतं नाही।

इंद्रधनु पसरला या टोका कडुन त्या टोका कडे,
तो सप्त रंगीच का? ते अजुनही कळत नाही।

तो चकोर वेडा! चांदण्याचा तहानलेला!
ही तहान चांदण्याची काय? मज कळत नाही ।

श्रावणांत मेघ बरसतो बनांत नी पानांत,
मोरास ह्याचा घे मोठा आनंद, का ?कळत नाही ।

वैशाखात पाऊस बरसला, मातीत सुगंध दरवळला,
मन माझे का उमलून प्रसन्न झाले, खरंच कळत नाही ।

तो तृषित वैरागी एक, मी तहान फेडली,
माझेच मन तृप्त का झाले, कळत नाही।

हा कोण जाणता,अंतरात माझ्या दडला,
ज्यास सर्व उमगते, कळते! हे कळत नाही ।

मंगळवार, १/९/२६ , १०:०० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

सुलह


आँखें डबडबा गईं रौशनी से,
सहर ने शायद शरारत की मुझसे।

मैं अँधेरों में रहने का आदी हूँ,
आफ़ताब ने छेड़खानी की मुझसे।

आँखों की शबनम को सँभाल लिया मैंने,
कली की ओस मगर सही न गई मुझसे।

हवा ने भी छुआ तो लरज़ उठा दिल,
ये नाज़ुक-मिज़ाजी कहाँ ले चली मुझसे।

धूप का एक टुकड़ा गिरा जो आँगन में,
बरसों पुरानी ख़ामोशी दरक गई मुझसे।

अब चाँद से भी लगती है कुछ तपिश-सी,
शायद हर उजाला यही कह गया मुझसे।

सितारों की चिलमन में छुप के देखा,
मगर एक किरण भी न छुपी मुझसे।

शजर की परछाई में पनाह ढूँढी,
मगर पत्तों ने धोखा किया मुझसे।

अब सोचता हूँ बुझा दूँ हर एक दीया,
मगर दिल की लौ भी तो बुझी न मुझसे।

फिर सोचा शायद यही तो मंज़िल थी,
अँधेरा तो बस खेल रहा था मुझसे।

रौशनी से भागकर मैं जाऊँ कहाँ,
वो ख़ुद मेरे अंदर छुपी थी मुझसे।

अब आँखें डबडबाती नहीं उजाले से,
ये सुलह शायद ख़ुद रौशनी ने की मुझसे।

मंगलवार, १/९/२६ , ६:०० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Monday, 31 August 2026

इश्क़


चाहत का दावा तो सभी करते हैं,जान मगर कहाँ फ़िदा करते हैं।

घूँट पीकर भी ज़हर का अक्सर,इश्क़ वाले कहाँ मरा करते हैं।

दिल को रखकर हथेली पर अपने,लोग फिर भी कहाँ डरा करते हैं।

जो न पाएँ कभी ख़ुशी अपनी,हम उन्हीं के लिए दुआ करते हैं।

दर्द जितना भी हो नसीबों में,इश्क़ वाले कहाँ गिला करते हैं।

ज़ख़्म अपनों से मिल भी जाएँ तो,फिर भी हम उनसे बस वफ़ा करते हैं।

जिसको खोकर भी भूलना चाहें,उसकी यादें सदा रखा करते हैं।

इश्क़ में हारना भी जीत है यारो,इश्क़ वाले यही कहा करते हैं।

मौत आए तो आए इश्क़ में हम,ज़िंदगी को क़ज़ा करते हैं।

'मेघ' ये कैसी अजब मोहब्बत है,लोग जीते हुए मरा करते हैं।

सोमवार, ३१/८/२६ , ७:१८ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

ओस की एक बूँद




थी एक कली बड़ी नाज़ुक-सी,
पत्तों के बीच थोड़ी सहमी-सी,
ओस ज़रा-सी क्या पी ली उसने,
वह खिल गई एक गुलशन-सी।

कल तक थी जो ख़ामोश-सी,
अपने ही डर में सिमटी-सी,
छू गई किरण जब भोर की उसको,
महक उठी फिर मधुबन-सी।

हवा चली तो पंखुड़ियाँ बोलीं,
बिखरी ख़ुशबू कुछ अनकही-सी,
जिसको समझा था अंत सफ़र का,
वह निकली नई शुरुआत-सी।

धूप मिली तो रंग निखरने लगे,
रात गई तो आँखें खुलीं,
एक बूँद ने इतना भर दिया,
सूनी शाख़ पे सौ ख़ुशियाँ खिलीं।

जीवन भी कुछ ऐसा ही है,
कभी धूप, कभी बदली-सी,
बस प्रेम की ओस ज़रा मिल जाए,
रूह खिल उठे उस कली-सी।

कल जो थी सहमी, आज वही तो
बन बैठी है ख़ुशबू बनकर,
एक नन्हीं-सी ओस की बूँद ने
जीना सिखला दिया मुस्काकर।

सोमवार, ३१/८/२६, ०२:०२ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Friday, 28 August 2026

बुरे भी, भले भी ...


दुनिया से सभी जाएँगे, बुरे भी, भले भी,
साथ ज़िंदगी का खोएँगे, बुरे भी, भले भी।

ज़िंदगी ने देखे जितने, ख़्वाब सभी टूटेंगे,
आज हँसें जो कल रोएँगे, बुरे भी, भले भी।

वक़्त एक दिन सबका हिसाब माँगेगा यहाँ,
आँसू सभी बहाएँगे, बुरे भी, भले भी।

मिट्टी में मिलेंगे सब, न ऊँच रहे न नीच,
इक रोज़ फ़ना सब होंगे, बुरे भी, भले भी।

चाहे जो भी हो नाम-ओ-निशाँ इस जहाँ में,
इक दिन तो भुलाए जाएँगे, बुरे भी, भले भी।

‘मेघ’ इतना गुरूर क्यों, ये ज़िंदगी दो दिन की है,
आख़िर ख़ाक में मिल जाएँगे, बुरे भी, भले भी।

शनिवार, २९/८/२६ , ९:२० AM
अजय सरदेसाई -मेघ

बेख़बर है...


कैसा सफ़र है, मंज़िल से राहगर बेख़बर है,
मैकदों से भरा शहर है, मगर बशर बेख़बर है।

किसे ढूँढ़ता रहा ता-उम्र, किसे मालूम है,
जिसे अपना समझा था, वही रहबर बेख़बर है।

दरख़्तों ने तो मौसम की ख़बर रखी है अब तक,
मगर अपनी ही जड़ों से हर शजर बेख़बर है।

जाम हाथों में लिए बैठे हैं प्यासे सारे रिंद,
मैकदा आबाद है, फिर भी साक़ी बेख़बर है।

रास्ते ख़त्म हो जाएँ, फिर कहाँ जाए मुसाफ़िर,
जाने क्यों मंज़िल से अब तक मेरी डगर बेख़बर है।

मेघ, शायद राज़-ए-हस्ती यही है आख़िरकार—
जो समझता है ख़ुद को, वो ही रहबर बेख़बर है।

शुक्रवार, २८/८/२६, ११:३० PM
अजय सरदेसाई — मेघ

कितने आईने टूटे...

 




अल्फ़ाज़ तेरे यूँ थे कि हम टूटे, कितने भरम, कितने दिल टूटे।

रिंद से न पूछो दिल की तड़प, जब सामने मय के पैमाने टूटे।

फ़ुरकत इतनी लंबी न कर, कि मिलने के हौसले टूटे।

सर पे कफ़न ले चले हैं उस जानिब, अब चाहे दिल टूटे या बदन टूटे।

मेघ, अब किस बात का शिकवा करें, कितने अक्स छूटे, कितने आईने टूटे।

शुक्रवार, २८/८/२६ — ११:११ AM अजय सरदेसाई — मेघ

Wednesday, 26 August 2026

जरुरी तो नहीं।



तुम भी मुझसे प्यार करो, ये ज़रूरी तो नहीं,
मगर मुझसे नफ़रत करो, ये भी ज़रूरी तो नहीं।

हर मोड़ पे मेरे साथ ही चलो, ये ज़रूरी तो नहीं,
बस राहों में तन्हा छोड़ो, ये भी ज़रूरी तो नहीं।

सुना है दर्द बाँटने से दर्द कम हो जाता है,
तुम मेरे ग़म में भी घिरो, ये ज़रूरी तो नहीं।

कभी तन्हाई में याद आ जाऊँ अगर मैं,
तो आँख भर के रो लो, ये ज़रूरी तो नहीं।

तेरा बसेरा मेरे दिल में है, ये जानते हैं सभी,
मेरा बसेरा तेरे दिल में हो, ये ज़रूरी तो नहीं।

मेरी चाहत का कोई हक़ नहीं तुम पर, ऐ हमदम,
बस मेरी चाहत से खफ़ा हो, ये ज़रूरी तो नहीं।

मंगलवार, २६/८/२६ , १२:१५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ 

Friday, 21 August 2026

शर एक आला.... ->




शर एक आला नी श्रावणाचा प्राण घेऊनी गेला,
इतिहास पुढेच घडला, दशरथाचा राम घेऊनी गेला।

शापाने केली दोघांची ताटातूट, रामास वनवास ठोठावून गेला,
पुत्रवियोग न साहवे दशरथाला, प्राण त्याचा देह सोडून गेला।

किती कठोर होती नियती, श्रावण बाळाची,
तितकीच कठोर होती नियती दशरथाची।

एक पिता रडला वनी, आपल्या पुत्राच्या शोकातं,
एक पिता रडला राज्यी, आपल्या पुत्राच्या वियोगात।

एक क्षणाचा अपराध, आयुष्याची शिक्षा देऊन गेला,
शर एक, दोन पिढ्यांचा अंत करवून गेला।

इतिहास साक्षी, नियतीस जे घडवायचे तेच घडले,
त्या एका शब्दभेदी शराने, पुढले रामायण घडले।

शुक्रवार, २१/८/२६ , ०८:२५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Saturday, 15 August 2026

तिश्नगी


दिल में कोई अनकही सी तिश्नगी सी हो,
हर ख़ुशी के पीछे कोई ख़ामोशी सी हो।

दिखती नहीं तुम, एक छिपी परछाईं जैसी हो,
ख़्वाब हो, ख़्वाहिश हो, कविता हो—कौन हो?

पास नहीं फिर भी हर पल पास लगती हो,
साँसों में बसी कोई ख़ुशबू सी हो।

नाम नहीं मालूम, चेहरा भी अनजान है,
फिर भी दिल को क्यों इतनी पहचानी सी हो?

मैं ख़ुद से पूछूँ—ये कैसी तलब है मेरी,
तुम हक़ीक़त हो, या कोई कहानी सी हो?

शनिवार, १५/८/२६, ७:०० PM
अजय सरदेसाई - मेघ

Friday, 7 August 2026

आय लव्ह समवन मोर...




जन्म दिया तूने मुझे, दिया एक नया सवेरा,

तेरी हर साँस में बसा, बचपन है मेरा,

फिर भी दिल की धड़कन में, चाहत है कुछ और,

आय लव्ह यू मॉं, बट आय लव्ह समवन मोर...


तेरी ममता का ऋण, मैं भूलूँगा ना कभी,

तेरे आँचल की छाँव, मिलेगी ना फिर कभी,

फिर भी दिल की एक धड़कन, किसी और की ओर,

आय लव्ह यू मॉं, बट आय लव्ह समवन मोर...


तुमने चलना सिखाया, उँगली थाम के मुझे,

हर गिरने पे उठाया, सीने से लगा के मुझे,

आज वो ही हाथ थामे, खड़ा है कोई और,

आय लव्ह यू मॉं, बट आय लव्ह समवन मोर...


तेरा प्यार है सागर, उसका प्यार किनारा,

तूने जीवन सँवारा, उसने जीवन पुकारा,

तुझसे मिली है दुनिया, उससे मिला है दिल का छोर,

आय लव्ह यू मॉं, बट आय लव्ह समवन मोर...


मॉं, तेरी जगह दिल में, कोई ले ना सके,

उसकी जगह भी कोई, फिर ले ना सके,

दोनों प्यार हैं मेरे, दोनों का अलग है छोर,

आय लव्ह यू मॉं, बट आय लव्ह समवन मोर...


शनिवार, ८/८/२६ , ९:२५ AM

अजय सरदेसाई -मेघ 

Wednesday, 5 August 2026

जीवन गाणे....


 


जीवन गाणे...
व्हावे...
गातच येणे...
गातच जाणे...

या धरेवर...
न जाणे कितीदा...
झाले येणे-जाणे...

जीवन गाणे...
व्हावे...
गातच येणे...
गातच जाणे...

नव्या जन्माचे...
नवेच गाणे...
क्षितिजापलीकडून...
नवे सूर  अन् नवे तराणे...

जीवन गाणे...
व्हावे...
गातच येणे...
गातच जाणे...

गाणे तुझे नि माझे गाणे...
मिळून गाऊ आपुले गाणे...
कोण जाणे, भेट पुन्हा कधी...
अन् कधी अचानक...
निघून जाणे...

जीवन गाणे...
व्हावे...
गातच येणे...
गातच जाणे...

बुधवार, ५/८/२६ , ४:२५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Thursday, 30 July 2026

तुझ्या विना ( विरह गझल)


 

मतला:

तुझ्याविना इथे आता, स्थिरसा श्वास नाही

मनात नित्य तूच वसतेस, दुजा भास नाही

शेर १:

तुझी उपेक्षा जाळत असली, तरी त्रास नाही

प्रीतीच्याच वाटेवरती, माघारी प्रवास नाही

शेर २:

तुला पाहताच जडली प्रीती, दुसरा ध्यास नाही

या वेड्या हृदयामध्ये आता, कुणाचा वास नाही

शेर ३:

न ओठी तक्रार कुठली, डोळ्यांत आस नाही

वेदनेस व्यक्त करण्याचा, मनास प्रयास नाही

मक्ता:

तुझ्या परतण्याचा अजुनी, सुटला विश्वास नाही

हृदयाची हाक ऐक जरा तू, यात सायास नाही


गुरुवार, ३०/७/२६ , १२:०० PM

अजय सरदेसाई -मेघ

Tuesday, 28 July 2026

सावन की बदरियां

 


ठंडी हवा, काली घटा और पुरवइयां,

संदेश सावन का ले आई बदरइयां।

झूला भी पड़ गया, हर ओर गूंजी हैं कजरियां,

आँगन में नाच उठीं सखियां-सहेलियां।


मोर नाचे बन में, फैलाए पंखुड़ियां,

नदी भी उमड़ चली, तोड़ती किनारियां।

बूंदों ने जगा दीं धरती की अंगड़ाइयां,

हर पत्ता, हर डाली गाए सावन-रागिनियां।


बिजुरिया कड़की नभ में, गरजीं बदरियां,

खेतों में रोपें किसान हरी कतरियां।

पपीहा पुकारे प्रिय को, गूंजीं वादियां,

धरती दुल्हन बनी, ओढ़े हरी चुनरियां।


सोमवार, २७/७/२६. , ११:११ AM

अजय सरदेसाई -मेघ 

Monday, 27 July 2026

झुंज





माझी एक झुंज वाऱ्याशी,

जो उडवू पाहतोय सर्वस्व।

एक झुंज माझ्या मनाशी,

जे जडून राहतं हट्टाशी॥


एक झुंज या काळाशी,

जो थांबत कधीच नाही।

एक झुंज माझ्या स्वप्नांशी,

जी झंझावातात विझून जातात॥


एक झुंज माझ्या अश्रूंशी,

जे डोळ्यांबाहेर पडू पाहतात।

एक झुंज माझ्या स्मिताशी,

जे दुःखात हरवून जातात॥


एक झुंज नियतीशी,

जी रोज नवा डाव मांडते।

एक झुंज माझ्या धैर्याशी,

जे हरूनही पुन्हा उभं राहतं॥


जगतो आहे मी हे आयुष्य,

पण जगणं इतकं सोपं नाही।

जगण्यासाठी रोज झुंजावं लागतं

आयुष्याशीच — दुसरं काही नाही॥


या झुंजींच्या वाटेवर,

मीच माझा सखा ठरलो।

हार कितीही समोर आली,

तरी लढतच राहिलो॥


सोमवार, २७/७/२०२६ , ११:५० AM

अजय सरदेसाई -मेघ

Wednesday, 22 July 2026

अवशिष्ट


 

शब्द न उरले करण्या प्रेम व्यक्त,

का, कसे, केव्हा झाले शब्द रिक्त!


शब्द झिजले, प्रेम, प्रेम ना उरले,

तो उन्माद सरला, ते आकर्षण न उरले.


जीवनाची संध्याकाळ आली जवळ,

जे उरले अवशिष्ट, ते स्मरण केवळ.


ना खंत उरली, ना उरली आस,

फक्त उरला एक शांत, मोकळा श्वास.


राहिला मनात कुठेतरी एक विचार घन,

एकदा प्रेम केले होते उत्कट, हेच खरे धन.


बुधवार, २२/७/२६, १२:४५ PM

अजय सरदेसाई – मेघ

Tuesday, 21 July 2026

सजल नयन निरोप तुज आई


 

सजल नयन निरोप तुज आई
सजल नयन निरोप तुज आई

आज स्मरते ती अंगाई तुझी आई
तू गातसे जी निजवण्या मज आई
डोक्यावर मायेचा फिरवून हात
ऐकवीन म्हणतो तुला ती आई
परी तू आज गेली चिर निद्रेत आई.

सजल नयन निरोप तुज आई

शाळेत सोडाया येसी तू आई
पुस्तकांत भरसी स्वप्न नवी आई
कष्टाचे घाम गाळून तुझे
मोठा केलेस मला घडवुनी आई
परी तू आज गेली चिर निद्रेत आई.

सजल नयन निरोप तुज आई

माझ्या यशात तुझे हसू खुलते आई
सुख माझे तुझ्या डोळ्यांत दिसते आई
कधी न सांगिले दुःख तुझे मज
आनंदातच जगली आयुष्य आई
परी तू आज गेली चिर निद्रेत आई.

सजल नयन निरोप तुज आई

आज घरात स्तब्ध शांतता आई
तुझ्याविना रितेपण दाटते आई
संस्कारांचा वसा तुझा घेऊन
जगेन पुढे मी नाव तुझे आई
परी तू आज गेली चिर निद्रेत आई.

सजल नयन निरोप तुज आई

मागणे माझे आज परमेश्वरास आई
माझ्या पोटी पुढला जन्म मिळो तुज आई,
तू मुलगा नी मी आई तुझी व्हावे, आई
सांग तुही हेच देवाला, शपथ माझी तुला आई.

सजल नयन निरोप तुज आई
सजल नयन निरोप तुज आई


मंगळवार, २१/७/२६ , १२:४५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Saturday, 18 July 2026

जरुरी है अभी


 

अपनी एक और मुलाक़ात ज़रूरी है अभी,

अपनी और गहरी पहचान ज़रूरी है अभी।


अजनबियों से प्यार यूं ही कभी करते नहीं,

अपना थोड़ा और परिचय होना ज़रूरी है अभी।


दिल की बातें लफ़्ज़ों में कहां आती हैं सदा,

कुछ ख़ामोशी का भी बयान ज़रूरी है अभी।


फूल यूं ही नहीं खिलते बस मौसम के आने से,

प्यार की थोड़ी बरसात ज़रूरी है अभी।


अपनी एक और मुलाक़ात ज़रूरी है अभी,

अपनी और गहरी पहचान ज़रूरी है अभी।


रास्ते ख़ुद-ब-ख़ुद मंज़िल नहीं बन जाते कभी,

साथ चलने का इरादा ज़रूरी है अभी।


चाहें कितनी भी हों, वक़्त मांगती है ये राह,

थोड़ा सब्र, थोड़ी बात ज़रूरी है अभी।


तुम बस मुझसे अभी प्यार का वादा लो,

और कुछ नहीं, प्यार का इत्मीनान तो हो अभी।


अपनी एक और मुलाक़ात ज़रूरी है अभी,

अपनी और गहरी पहचान ज़रूरी है अभी।


शनिवार, १८/७/२६। , ११:०० AM

अजय सरदेसाई -मेघ

Friday, 17 July 2026

शोध आकाशात


 


अनंत तारे, नेमका माझा कोणता,आकाशात?

का त्याला उगवायचे आहे अजुन, आकाशात?


हा त्याचा, तो ह्याचा,कळते ना,पाहुन आकाशात 

ती रात्र येईल कधी, हा माझा, मी म्हणेन,पाहुन आकाशात?


कधी कधी आकाश पाण्यात अलवार उतरते,

अमर्याद नसते, मी उतरतो शोधत तारा त्या आकाशात!


एकदा ती मला पाहुन लाजत हसली,चांदणी,

तेव्हा कळलं,तारे नव्हते माझे,चांदणी होती, आकाशात.


"मेघ" म्हणतो, तारा शोधणे संपले आता,

एक हसरी चांदणीच माझे विश्व झाली, आकाशात.


शुक्रवार, १७/७/२६ , ४:१५ PM

अजय सरदेसाई -मेघ

Wednesday, 15 July 2026

नक्षत्र मिळते का पाहु



 

पुळणीवर चालताना, आकाशातील नक्षत्रे पाहू,
तुझे नी माझे जुळणारे, नक्षत्र मिळते का पाहू।

लाटांच्या स्पर्शाने पाउले भिजली दोघांची,
ओल्या वाळूत ती एकमेकांत मिसळून पाहू।

तुझ्या केसांत अडकला खट्याळ वारा खारा,
त्या वाऱ्याच्या तालावर जरा धुंद होऊन पाहू।

पुळणीवर चालताना, आकाशातील नक्षत्रे पाहू,
तुझे नी माझे जुळणारे, नक्षत्र मिळते का पाहू।

बोलायचे आहे तुझ्याशी, पण शब्दच अपुरे,
नजरेच्याच भाषेत सारे, आपण बोलून पाहू।

रात्र सरावी न इतक्यात, थांबावा हा क्षण आता,
खांद्यावर टेकून अशीच जरा, तू विसाव पाहू।

पुळणीवर चालताना, आकाशातील नक्षत्रे पाहू,
तुझे नी माझे जुळणारे, नक्षत्र मिळते का पाहू।

या नक्षत्रांच्याही पल्याड, एक आकाश शोधू,
एकमेकांचं ते आकाश, आपणच होऊन पाहू।

बुधवार, १५/७/२६ , १०:३० AM
अजय सरदेसाई -मेघ

Sunday, 12 July 2026

आस ये थी, कुछ काम मिले


बस आस ये थी कि कुछ काम मिले,
तेरे शहर में सिर्फ़ इल्ज़ाम मिले।

कुछ दर्द भी मिले ज़िंदगी भर के लिए,
और न चाहते हुए भी कुछ नाम मिले।

सुना था शहर ये तेरा कभी रुकता नहीं,
मगर जो भी मिले, यहाँ मुझे नाकाम मिले।

ढूँढ़ा बहुत यहाँ मैंने शोहरत को,
यहाँ दौलतमंद सारे बदनाम मिले।

गाव में मेरे जिंदगी छलकती थी,
यहॉं मुझे न कोई ऐसे मकाम मिले।

आख़िर बहुत सोचकर मे वापिस गाव लौटा,
उफ़! देख़ा तो हर घर में शहर के अंजाम मिले।

बस इतनी सी है  फ़रियाद 'मेघ',
कहीं तो दिल को सुकूं का जाम मिले।

सोमवार, १३/७/२६ ,१०:४० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Friday, 10 July 2026

ढूँढ के देखो...( सुफी तरन्नुम)

 


हम अगर अपने घर में न मिलें,तो तन्हाइयों से पूछो,
हम उम्मीद के हर किरण में मिलेंगे,तुम ढूँढ के देखो।

शगुफ़्ता किसी कली में नहीं,तो और कहाँ होगी,
हर कली में ये मुस्कान मिलेगी,तुम बाग़ में देखो।

बाहर जो दुनिया है,वह बस एक छलावा है,
गर असली देखने की ख़्वाहिश है,अंदर झाँक के देखो।

आँखें जो देखती हैं,अक्सर सच होता नहीं है,
सच जानने की चाहत है?तो दिल खोलकर देखो।

ज़िंदगी वो शय है,जिसे समझना है मुश्किल,
गर समझना चाहते ही हो,तो उसे जी कर देखो।

किसी गैर से नफ़रत करना,औबड़ी बात नहीं,
अगर कुछ करना है तो,गैर को चाहकर देखो।

शनिवार, ११/७/२६ , ११:३० AM
अजय सरदेसाई -मेघ 

कोशिश न कर (सुफी तरन्नुम)


हम तो हर इम्तिहान से गुज़रे हैं,
तू हमें और आज़माने की कोशिश न कर।

ज़िंदगी ख़ुद ही एक आज़माइश है,
तू जीना सिखाने की कोशिश न कर।

हर सफ़र की धूप से वाकिफ हैं हम,
तू हमें साया दिखाने की कोशिश न कर।

दर्द अपना हमने ख़ुद ही सह लिया है,
तू मरहम लगाने की कोशिश न कर।

हर सवाल का जवाब हम दे चुके हैं,
तू फिर से सुनाने की कोशिश न कर।

 इस जहान के लिए कब से फ़ना हो चुके हम,
तू हमें वापस बुलाने की कोशिश न कर।

शनिवार
, ११/७/२६ , ९:५० AM
अजय सरदेसाई -मेघ 

Wednesday, 8 July 2026

जा रे पिया ( राग यमन)

 

स्थायी: ( मुखड़ा)
ओ रे पिया, पिया, ओ मोरे पिया
जा रे, जा रे, तू जा रे मोरे पिया॥

( दुल्हन - अंतरा १)
सेहरा उतरा ना था अभी तक,
बजी रणभेरी रे।
मेहंदी का रंग अभी ना उतरा,
कर्तव्य के आगे प्रेम भी हारे॥

(दुल्हा अंतरा २)
धीरज धर तू, साहस रखियो,
मन में मिलन की आस धरे।
जीत के लौटूँ, वचन है मेरा,
मिलन की आस कभी ना हारे॥

( दुल्हन अंतरा ३)
देश-धरम का बुलावा माना,
शीश झुकाया रे।
बाट जोहूँ मैं, दिन गिनूँ पल-पल,
प्रतीक्षा के आगे समय भी हारे॥

( दुल्हा-दुल्हन  अंतरा ४)
जनम-जनम का साथ हमारा,
फिर मिलेंगे रे।
प्रेम लौटे फिर जनम लेकर,
प्रेम के आगे नियति भी हारे॥

 बुधवार, ८/७/२०२६ , ०१:१० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Sunday, 5 July 2026

घन-घन बाजत घनघोर बदरा ( बंदीश)

घन घन बाजत घनघोर बदरा,
चमचम दामिनी लखलखत बैरी।
सनसनन पवन उड़त सैरभैर,
सावन का संदेशा कहत रहो॥

कलेस भी करे है, प्रेम भी भयो है,
बरसत नीर मोरे मन को हर्यो है।
नीर भिगोयो मोहे सिर से पाँव तक,
फिर पवन मोहे देख-देख छले है॥

पवन बने कबहूँ मलय सुगंधित,
कबहूँ बने ये विष सम बैरी।
साजन की आस दिखाए झूठी,
फिर तरसाए, मन करे न धैरी॥

अरी पवन, अब रुक जा मेरी,
क्यों करे तू इतनी मनमानी।
पिया लौं जो बात पहुंचाऊं,
तोहे न छोड़िहैं मोरे सजनवा रे॥

रविवार, ५/७/२६ , १०:०० PM 
अजय सरदेसाई -मेघ 

Wednesday, 17 June 2026

फुलराणी


 


तूच ग सखे माझी फूलराणी,
तुझ्याचसाठी माझी सर्व गाणी।
तूच माझी बाग, मीच तुझा माळी,
तुझ्याविण सखे, सुनी झाडाची डहाळी।।

बागेस जेव्हा तुझी चाहूल लागली,
माझ्या सोनचाफ्याची कळी खुलली।
मोगऱ्याची वेल सरसर चढली,
मोगऱ्याची फुले बहरली।।

बागेस कळले पानोपानी,
जडली प्रीत दोघांच्या मनी।
तुझ्या नजरेची पडता सावली,
फुलाफुलांत प्रीत आपली विसावली।।

गंध दरवळला बागेत चोहीकडे,
फुलपाखरे भिरभिरती तिकडे।
चांदण्यांनी जणू रात्र सजविली,
प्रीतीची वाट फुलांनी भरली॥

कोकिळेने छेडली तान,
हरपून गेले माझे भान।
तू गाण्याची छेडली तार,
हृदयात जणू झंकारली सतार।।

मंगळवार, १९/६/२६ , ११:५५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Saturday, 13 June 2026

काही नर्म क्षण.....




काही नर्म क्षण सुंदर रुजले मनात,
त्या स्मृतींचे चित्र पुन्हा रंगले मनात।

जे गीत मी गायले तुझ्यासाठी तेव्हा,
ते गीत आजही हळवे गुणगुणले मनात।

तुझे स्मितहास्य अन् ते बोलके डोळे,
अजूनही सांजवेळी हळवे खुलले मनात।

तू दूर असूनी जवळीक तशीच रहावी,
हे न उलगडे कोडे, किती साचले मनात।

असेल "मेघ" जोवर ह्या धरेवर,
प्रेम तुझेच खोलवर रुजले मनात।

शनिवार, १३/६/२६ , २:०० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Friday, 12 June 2026

सांजरंग

 


बाजींद वारा, समुद्र किनारा,
व्याकुळ लाटा, पुळणीच्या वाटा।
शंख-शिंपले रेतीवर पसरले,
मनमोहक हा निसर्ग सारा।।

डोंगर माथा, चिंचोळ्या रान वाटा,
झाडांची सळसळ, सरसर पानगळ।
पक्ष्यांची किलबिल,झऱ्यांची खळखळ,
निसर्गाचा आनंद, हृदयी निखळ।।

सखी पावस सर, वाराही सखा,
निसर्गाशी जडला अनोखा धागा।
एकीमुळे मनात दाटे ओलावा,
दुसऱ्यामुळे हृदयी सुखद गारवा।।

रानात जाणे कुठे बोले पारवा
मनात छेडीला कुणी मारवा।
क्षितिजावर चढला रंग केशरी,
सांज सजली घेऊन सूर मंजीरी।।

शुक्रवार,१२/६/२६ , ४:२५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Thursday, 11 June 2026

अधांतरी...



प्रेम आहे,
तुझ्यावर, की प्रेमाच्या कल्पनेवर,
अजून कळायचे आहे.

ते उलगडेल कधी!
की मीच समजावीन स्वतःला,
माहीत नाही!

पण प्रेम नक्की आहे...? कदाचित...
हा प्रश्न आहे की उत्तर?
अजून उलगडायचे आहे!

पण छान वाटतं आहे,
कदाचित प्रेमाची कल्पनाच सुंदर असते.
संमोहन असते,
आणि असेच संमोहित राहावेसे वाटते...
अधांतरी...

सत्य उलगडले,
तर जादू हरवेल याची भीती.
म्हणून उत्तरापेक्षा प्रश्नच प्रिय वाटतो,
कदाचित....

गुरुवार, ११/६/२६ , ३:३० PM
अजय सरदेसाई -मेघ 

चाहत का असर...


 

चाहत का असर अब कुछ मद्धम हो रहा है,
मेरी दीवानगी का खुमार कम हो रहा है।

ज़ख्मों का वो तूफ़ान भी पुरसुकून हो रहा है,
जो दर्द था कभी तेज़, अब नर्म हो रहा है।

तेरी याद का जो भँवर था, अब मिट रहा है,

दिल का वो पुराना वहम भी कम हो रहा है।

तूने जो न दिया कभी, वो माँगना छोड़ दिया,

शायद मुझ पर अक़्ल का करम हो रहा है।

टूटे हुए दिल पर अब वक़्त का हाथ है,

हर ज़ख्म धीरे-धीरे मरहम-सा हो रहा है।

शिकवों की किताबों को कब का बंद कर दिया,

अब ख़ुद से ही मेरा सलाम हो रहा है।

"मेघ" जो बरसता था, अब थमने लगा है वो,

इश्क़ की इस ज़मीन पर मौसम नर्म हो रहा है।

गुरुवार, ११ जून २०२६ | ११:११ AM

अजय सरदेसाई– मेघ

Wednesday, 10 June 2026

मैं घर बना रहा हूँ


 

मैं घर बना रहा हूँ, तू उसकी दीवारें बना,

हर दीवार से झाँकने, एक झरोखा बना।


धूप जब थक के बैठे, उसे भी छाँव मिले,

आँगन में प्यार का कोई, शजर पुराना बना।


रात उतरे तो उजालों की कमी महसूस न हो,

चाँद की राह दिखाता, तू कोई दीपक बना।


सिर्फ़ ईंटों से मकाँ, घर नहीं बन पाता,

रिश्तों की गर्माहट का, कोई कोना भी बना।


मैं नींव रख रहा हूँ, तू ऊपर छत चढ़ा,

मेरे हर ख़्वाब को, तू दीवार-सा आसरा बना।


और यदि तू ही बसे, इस दिल के मकाँ में कभी,

दरवाज़ा नहीं, बस एक झरोखा बना।


बुधवार, १०/६/२६, ३:०० PM

अजय सरदेसाई — मेघ 🌧️


Tuesday, 9 June 2026

प्रेम असे का असते?






प्रेम असे का असते?
नकळतच कुणावर जडते!
नजरेच्या अनावधानाने,
आयुष्यच सारे बदलते,
प्रेम असे का असते?

हेतू कुठलाही नसताना,
मन कुणासाठी झुरते,
गर्दीत हजारो चेहरे असता,
एकावरच येऊन अडकते,
प्रेम असे का असते?

त्याच्या एका हास्याने,
मन सारे मोहरुन जाते,
अबोल शब्दांमधले,
गुज सहज उमजते,
प्रेम असे का असते?

दूर असले तरी चित्त त्यापाशी,
डोळे न मिटताच मन स्वप्न बघते,
तो जवळ असता मनाचे फुलपाखरू होते,
प्रेम असे का असते?

सुख त्याचे आनंद देते,
दुःख त्याचे मनात सलते,
स्वतःहूनही अधिक त्याचे,
हित जपावे वाटते,
प्रेम असे का असते?

स्पर्शाविण कधी फुलते,
विरहातही कधी बहरते,
नजरेच्या डिठी-डीठी ,
सारे संभाषण होते,
प्रेम असे का असते?
प्रेम असे का असते?

मंगळवार, ९/६/२६ , ३:५५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Monday, 8 June 2026

सूर येती..., विरून जाती...


 



सूर येती... विरून जाती...
उरतात कंपने,..वाऱ्यावरी...,
हृदयावरी...
सूर येती... विरून जाती...

कोण स्वामी... या स्वरांचा,
सूर कुठून येती?
संमोहीत ही धरा...
संमोहीत राने होती.

वेणूचे सूर पडताच कानी...
मन, हृदय विरघळले,
त्या सूरांवर पहुडून सारे—
मी वृंदावन विहरले.

सूर येती... विरून जाती...
सूरांचीs.. सुप्त स्पंदने,
सप्तचक्रांत वसली,
नाद अनाहत उठता...,
भुजंगिनी......
जागृत झाली॥

मंगलवार, ९/६/२६ , ८:५५ AM
अजय सरदेसाई -मेघ

शांता शेळके यांच्या याच नावाच्या मुळ गीतावरुन स्फुरलेले,
 पं. हृदयनाथ मंगेशकर यांनी कंपोज केले आणि भारत रत्न लता दीदींनी गायलेले! 

अगं प्रेम असं कधी लपतंय गं?




अगं प्रेम असं कधी लपतंय गं?
अगं तुझ्या डोळ्यांत सगळं दिसतंय गं,
त्या नजरेत स्वप्न तरंगतंय गं,
अगं प्रेम असं कधी लपतंय गं?

अगं एकटीच का तू गुणगुणतेस गं,
श्वासांच्या भाषेत काही सांगतेस गं,
गालांवर उमललेलं फूल बोलतंय गं,
अगं प्रेम असं कधी लपतंय गं?

अगं लपून तू कटाक्ष टाकतेस गं,
भेटीच्या क्षणी का बावरतेस गं,
डोळ्यांतलं हसू उघडं पाडतंय गं,
अगं प्रेम असं कधी लपतंय गं?

चांदण्यांनाही आपली चाहूल लागलीय गं,
वाऱ्याने तुझी गोष्ट गुणगुणलीय गं,
साऱ्या आभाळाला खबर झालीय गं,
अगं प्रेम असं कधी लपतंय गं?


८ जून २०२६ । ७:४१ PM
अजय सरदेसाई 'मेघ'

Sunday, 7 June 2026

सखि, मंद झाल्या तारका - My version






सखि, मंद झाल्या तारका,
आता तरी येशील का?

ही रात्र रुपेरी चांदणी,
भरली मनात देखणी.
उणीव फक्त येथे तुझी,
सांग, तू येशील का?

हृदयात आहे प्रीत तुझी,
पाहतात डोळे वाट तुझी,
मनात ओढ भेटीची,
ती तू पूर्ण करशील का?

तो चंद्र तुलाच शोधतो,
सांगण्यास गुज तिष्ठतो.
माझी स्थिती ना वेगळी,
सांग, तू कधी येशील का?

हा काळ वेळ स्वप्नवत,
मन तुझ्या प्रेमात रत.
मी वाट पाहतो तुझी,
सांग तू येशील का?

सखि, मंद झाल्या तारका,
आता तरी येशील का?

रविवार, ७/६/२६ , ८:३० PM
अजय सरदेसाई - मेघ

Saturday, 30 May 2026

गुज बोलायचे आहे


तुझ्याशी गुज बोलायचे आहे,
मनातले सारे सांगायचे आहे।
डोळ्यांनी डिठी-डिठी,
न बोलताच सारे सा़धले आहे।।

ओठांवरी थांबले शब्द,
श्वासांत गाणे दाटले आहे।
तुझ्या अबोल सहवासात,
मन माझे हरखून गेले आहे।।

सांज उतरता वाटेवरती,
तुझी परतण्याची वेळ आहे।
तुझ्या डोळ्यांच्या कैदेतच,
दिवस सारा सरला आहे।।

हातात हात नसतानाही,
स्पर्श तुझा जाणवला आहे।
अंतर कितीही असले तरी,
धागा मनांचा जुळला आहे।।

"मेघ" अजूनही न बोलता,
किती काही उमगले आहे।
गुज बोलण्याआधीच रे,
प्रेम मनाशी जडले आहे।।

अजय सरदेसाई — मेघ
रविवार, ३१/५/२६ , ११:०० AM
अजय सरदेसाई -मेघ