चमचम दामिनी लखलखत बैरी।
सनसनन पवन उड़त सैरभैर,
सावन का संदेशा कहत रहो॥
कलेस भी करे है, प्रेम भी भयो है,
बरसत नीर मोरे मन को हर्यो है।
नीर भिगोयो मोहे सिर से पाँव तक,
फिर पवन मोहे देख-देख छले है॥
पवन बने कबहूँ मलय सुगंधित,
कबहूँ बने ये विष सम बैरी।
साजन की आस दिखाए झूठी,
फिर तरसाए, मन करे न धैरी॥
अरी पवन, अब रुक जा मेरी,
क्यों करे तू इतनी मनमानी।
पिया लौं जो बात पहुंचाऊं,
तोहे न छोड़िहैं मोरे सजनवा रे॥
रविवार, ५/७/२६ , १०:०० PM
अजय सरदेसाई -मेघ






































