प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Saturday, 30 May 2026

दिल की बात


 


मतला
दिल की बात है, अपने दिलदार से कहो,
नुमाइश होगी गर किसी अग़यार से कहो।

दर्द-ए-दिल को यूँ न हर दरबार से कहो,
जो इसका मोल समझे, उस हक़दार से कहो।

इश्क़ की तिश्नगी को समझे जो ख़ुद दिलफ़िगार,
अपना दर्द उसी से कहो, उस ग़मख़्वार से कहो।

जहॉं दिल का नहीं, बस दौलत का हो कारोबार,
रूह की प्यास का क़िस्सा न उस मक्कार से कहो।

राज़ बिखर जाते हैं अक्सर सरे-बाज़ार में,
दिल का राज़ अपने महरम-ए-असरार से कहो।

ज़ख़्म गहरे हों तो हर शख़्स नहीं मरहम बने,
दर्द अपना किसी दर्दगुज़ार से कहो।

दिल की राह में न रखना कभी कोई दीवार,
जो भी कहना हो, खुलकर अपने यार से कहो।

जो लफ़्ज़ दिल से निकलें, वो होते हैं असरदार,
ऐसे सुख़न ही कहो, ऐसे इज़हार से कहो।

मक़्ता
"मेघ" चाहो गर मोहब्बत को मिले उसका जवाब,
अपने दिल की बात बस इक बार प्यार से कहो।

शनिवार, ३०/५/२०२६ , १०:३० AM
अजय सरदेसाई -मेघ

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