मिलने की है तुझे ये जो ख़्वाहिश, दिल से निकली है,
तुझसे खुलकर बातें करने की कोशिश, दिल से निकली है।।
तुझसे खुलकर बातें करने की कोशिश, दिल से निकली है।।
दिल खोलकर तुझे दिखाने की ख़्वाहिश, दिल से निकली है,
ये मेरे सब्र की आख़िरी आज़माइश, दिल से निकली है।।
कल रात भर चाँद तकता रहा तुझे फलक से,
उस चाँद से मेरी जलन-ओ-रंजिश, दिल से निकली है।।
तेरी ख़ामोश नज़रों में जो इक हल्की सी बारिश है,
उसमें भीग जाने की ये ख़्वाहिश, दिल से निकली है।।
तेरे जाने के बाद भी तेरा एहसास फिर भी ठहरा है,
इस सूने दिल में फिर से धड़कने की कशिश, दिल से निकली है।।
तेरे धड़कनों की लरज़िश मुझे सुनाई देती है,
बेचैनी में डूबी ये हल्की सी ख़्वाहिश, दिल से निकली है।।
मिलो तो मिरे अनकहें लफ़्जों को भी सुनना 'मेघ',
मेरी हर लरज़ती धड़कन की गुज़ारिश, दिल से निकली है।।
बुधवार, १३ मई २०२६ , ५:३५ PM
अजय सरदेसाई 'मेघ'

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