झरना, नदी, सागर, महासागर — सब तो एक ही पानी हैं,
फिर क्यों छमछम, कलकल, घर्रघर्र, ॐ — अलग-अलग कहानी हैं?
मेघ अलग, जल अलग, दोनों के अलग विधान हैं,
फिर क्यों दोनों के आँचल में — एक ही नीला आसमान है?
मिट्टी, पाषाण, वन, पर्वत — सबकी अपनी पहचान है,
फिर क्यों हर कण के भीतर — एक ही मौन निशान है?
सूरज, चंदा, दीपक, जुगनू — सबकी अपनी ज्योति है,
फिर क्यों हर उजियारे में — वही एक लौ होती है?
देह अलग, मन अलग, अलग सभी की माया है,
फिर क्यों रोते क्षण में — हर आँसू खारा पाया है?
जन्म अलग, पथ अलग, अलग सभी की यात्राएँ हैं,
फिर क्यों अंतिम श्वास में — सब शून्य में खो जाएँ हैं?
शायद यही रहस्य है — जिसे सब "अस्तित्व" कहते आए हैं,
एक ही तत्त्व से उठकर हम — फिर उसी में समाए हैं।।
बुधवार, १३/५/२६ , ११:०० AM
अजय सरदेसाई -मेघ

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