अपना पता बता ज़िंदगी,
काफी दिनों से तुझसे मिला नहीं।
तू दिखती है कैसी, ज़िंदगी —
कुछ तो बता, ज़िंदगी।।
काफी दिनों से तुझसे मिला नहीं।
तू दिखती है कैसी, ज़िंदगी —
कुछ तो बता, ज़िंदगी।।
कभी हँसी में छुप जाती है,
कभी आँसू बन बह जाती है।
छूने को हाथ बढ़ाऊँ तो,
मुट्ठी से फिसल जाती है, ज़िंदगी।।
दौलत में तलाशा तुझे बहुत,
रिश्तों में भी थाम न पाया।
मिली तू उन ख़ामोश लम्हों में,
जहाँ कोई उम्मीद न थी, ज़िंदगी।।
कभी मंदिर की सीढ़ी चढ़ा,
कभी सजदों में माथा टेका।
मिली तू उस मासूम दुआ में,
जो होंठों पर काँप रही थी, ज़िंदगी।।
भागती रही उम्र यूँ ही,
तेरे निशाँ खोजते-खोजते।
तू थी मेरे भीतर ही कहीं —
मैं बाहर भटकता रहा, ज़िंदगी।।
रविवार, २४/५/२०२६, ४:०० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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