ये शायद उसकी ख़्वाहिश है, दिल से निकली होगी।
ये ज़िंदगी की फ़रमाइश है, दिल से निकली होगी।।
ये ज़िंदगी की फ़रमाइश है, दिल से निकली होगी।।
झरने की वो छमछम हो, या सागर की शांतता,
ये उसके सृजन की नुमाइश है, दिल से निकली होगी।।
आँखों में जो नमी है, होंठों पे जो ख़ामोशी,
ये किसी दर्द की पैदाइश है, दिल से निकली होगी।।
मिट्टी से उठे हम सब, मिट्टी में मिल जाएँगे,
ये उसी की रवाइश है, दिल से निकली होगी।।
माँ की जो दुआएँ थीं, अब भी कहीं गूँजती हैं,
ये रूह की सदाइश है, दिल से निकली होगी।।
शून्य में जो खो जाएँ, वो खोते कहाँ हैं ‘मेघ’,
ये जो वापसी की ख़्वाहिश है, दिल से निकली होगी।।
बुधवार, १३/५/२६ , १:४८ PM
अजय सरदेसाई ‘मेघ’

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