प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Wednesday, 13 May 2026

दिल से निकली होगी...





ये शायद उसकी ख़्वाहिश है, दिल से निकली होगी।
ये ज़िंदगी की फ़रमाइश है, दिल से निकली होगी।।

झरने की वो छमछम हो, या सागर की शांतता,
ये उसके सृजन की नुमाइश है, दिल से निकली होगी।।

आँखों में जो नमी है, होंठों पे जो ख़ामोशी,
ये किसी दर्द की पैदाइश है, दिल से निकली होगी।।

मिट्टी से उठे हम सब, मिट्टी में मिल जाएँगे,
ये उसी की रवाइश है, दिल से निकली होगी।।

माँ की जो दुआएँ थीं, अब भी कहीं गूँजती हैं,
ये रूह की सदाइश है, दिल से निकली होगी।।

शून्य में जो खो जाएँ, वो खोते कहाँ हैं ‘मेघ’,
ये जो वापसी की ख़्वाहिश है, दिल से निकली होगी।।

बुधवार, १३/५/२६ , १:४८ PM
अजय सरदेसाई  ‘मेघ’

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