प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Wednesday, 20 May 2026

पता थे मुझे


 

तेरी उल्फतों के मायने पता थे मुझे,
मेरी उम्मीदों के दायरे पता थे मुझे।

मोहब्बत की मगर चाही नहीं कभी,
तेरे मेरे बीच के फ़ासले पता थे मुझे।

एक पत्थर से प्यार हुआ — यही नसीब,
इस सफ़र के सारे ज़ाब्ते पता थे मुझे।

तेरी ख़ामुशी भी पढ़ लिया करता था,
लफ़्ज़ों के अपने मसले पता थे मुझे।

तू बदल गया तो हैरत नहीं हुई मुझको,
वक़्त के भी अपने फ़ैसले पता थे मुझे।

हम ने हँस के काट दी तन्हा ये ज़िंदगी,
अश्क़ों के बहने के सिलसिले पता थे मुझे।

अब शिकायतों का कोई सिलसिला नहीं,
अहबाब के सारे बहाने पता थे मुझे।

मंगलवार, २०/५/२६ , १२:२५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ