प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Tuesday, 22 September 2026

दोस्ती


तू नज़र में न आए कहीं, इसलिए मैं मुड़ गया,
हमारी मुलाक़ात न हो, इसलिए मैं मुड़ गया।

दोस्ती की हसीं यादें अब भी ज़िंदा हैं दिल में,
वो कभी कड़वी न हो जाएँ, इसलिए मैं मुड़ गया।

आँखों में अचानक भर आए अनजाने आँसू,
तू उन्हें कभी न देखे, इसलिए मैं मुड़ गया।

अपनी दोस्ती इमली-बेरों जितनी पुरानी थी,
सूख गए वो पेड़ अब, इसलिए मैं मुड़ गया।

बचपन, स्कूल, कॉलेज कब के पीछे छूट गए,
पर आवाज़ तेरी गूँजे कानों में, इसलिए मैं मुड़ गया।

तेरी आँखों में आज दिखे कई सवालों के निशान,
उन्हें सुलझाऊँ भी तो कैसे, इसलिए मैं मुड़ गया।

लबों पर थे तेरे खातिर कई लफ़्ज़ सँभाले हुए,
वो व्यर्थ ही न बह जाएँ, इसलिए मैं मुड़ गया।

'मेघ', बरसात जमा हो रखी है आँखों में इतनी,
सैलाब में कहीं बह न जाएँ यार, इसलिए मैं मुड़ गया।

मंगलवार, २२/९/२६, ७:०० PM
अजय सरदेसाई — मेघ