अस्तित्व का मेरे संघर्ष चलता रहा,
सुतपुत्र मुझे सारा जमाना कहता रहा।
सुतपुत्र मुझे सारा जमाना कहता रहा।
कवच कुंडल जन्मजात थे मेरे पास,
जमाना कुत्सित नजरों से मुझे ही देखता रहा।
बाणों में मेरी ऊर्जा थी कई सूर्यो की,
अर्जुन का गुणगान फिर भी चलता रहा।
मांगते वक्त सभी ने मेरी ओर देखा,
धर्मराज! लेकिन युधिष्ठिर को ही जग कहता रहा।
हे कृष्ण, तूने चतुराई से हाथ बांधे मेरे,
रिश्ते का कवच ओढ़कर अर्जुन बढ़ता रहा।
कालचक्र को धसाया कीचड़ में,
मृत्यु का शासन फिर मुझपर चलता रहा।
तू हमेशा सखा अर्जुन का ही बना रहा,
संघर्ष, कर्ण का मृत्यू बाद भी चलता रहा।
सोमवार, १६/३/२६ , ८:३६ PM
अजय सरदेसाई -मेघ
