प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Monday, 16 March 2026

संघर्ष अस्तित्व का


 


अस्तित्व का मेरे संघर्ष चलता रहा,
सुतपुत्र मुझे सारा जमाना कहता रहा।

कवच कुंडल जन्मजात थे मेरे पास,
जमाना कुत्सित नजरों से मुझे ही देखता रहा।

बाणों में मेरी ऊर्जा थी कई सूर्यो की,
अर्जुन का गुणगान फिर भी चलता रहा।

मांगते वक्त सभी ने मेरी ओर देखा,
धर्मराज! लेकिन युधिष्ठिर को ही जग कहता रहा।

हे कृष्ण, तूने चतुराई से हाथ बांधे मेरे,
रिश्ते का कवच ओढ़कर अर्जुन बढ़ता रहा।

कालचक्र को धसाया कीचड़ में,
मृत्यु का शासन फिर मुझपर चलता रहा।

तू हमेशा सखा अर्जुन का ही बना रहा,
संघर्ष, कर्ण का मृत्यू बाद भी चलता रहा।

सोमवार, १६/३/२६ , ८:३६ PM
अजय सरदेसाई -मेघ