प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Wednesday, 10 June 2026

मैं घर बना रहा हूँ


 

मैं घर बना रहा हूँ, तू उसकी दीवारें बना,

हर दीवार से झाँकने, एक झरोखा बना।


धूप जब थक के बैठे, उसे भी छाँव मिले,

आँगन में प्यार का कोई, शजर पुराना बना।


रात उतरे तो उजालों की कमी महसूस न हो,

चाँद की राह दिखाता, तू कोई दीपक बना।


सिर्फ़ ईंटों से मकाँ, घर नहीं बन पाता,

रिश्तों की गर्माहट का, कोई कोना भी बना।


मैं नींव रख रहा हूँ, तू ऊपर छत चढ़ा,

मेरे हर ख़्वाब को, तू दीवार-सा आसरा बना।


और यदि तू ही बसे, इस दिल के मकाँ में कभी,

दरवाज़ा नहीं, बस एक झरोखा बना।


बुधवार, १०/६/२६, ३:०० PM

अजय सरदेसाई — मेघ 🌧️