तेरी उल्फतों के मायने पता थे मुझे,
मेरी उम्मीदों के दायरे पता थे मुझे।
मेरी उम्मीदों के दायरे पता थे मुझे।
मोहब्बत की मगर चाही नहीं कभी,
तेरे मेरे बीच के फ़ासले पता थे मुझे।
एक पत्थर से प्यार हुआ — यही नसीब,
इस सफ़र के सारे ज़ाब्ते पता थे मुझे।
तेरी ख़ामुशी भी पढ़ लिया करता था,
लफ़्ज़ों के अपने मसले पता थे मुझे।
तू बदल गया तो हैरत नहीं हुई मुझको,
वक़्त के भी अपने फ़ैसले पता थे मुझे।
हम ने हँस के काट दी तन्हा ये ज़िंदगी,
अश्क़ों के बहने के सिलसिले पता थे मुझे।
अब शिकायतों का कोई सिलसिला नहीं,
अहबाब के सारे बहाने पता थे मुझे।
मंगलवार, २०/५/२६ , १२:२५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ
