ठंडी हवा, काली घटा और पुरवइयां,
संदेश सावन का ले आई बदरइयां।
झूला भी पड़ गया, हर ओर गूंजी हैं कजरियां,
आँगन में नाच उठीं सखियां-सहेलियां।
मोर नाचे बन में, फैलाए पंखुड़ियां,
नदी भी उमड़ चली, तोड़ती किनारियां।
बूंदों ने जगा दीं धरती की अंगड़ाइयां,
हर पत्ता, हर डाली गाए सावन-रागिनियां।
बिजुरिया कड़की नभ में, गरजीं बदरियां,
खेतों में रोपें किसान हरी कतरियां।
पपीहा पुकारे प्रिय को, गूंजीं वादियां,
धरती दुल्हन बनी, ओढ़े हरी चुनरियां।
सोमवार, २७/७/२६. , ११:११ AM
अजय सरदेसाई -मेघ
