ऐ ख़ुदा, काम तो वैसे कुछ नहीं है, बस एक बार देखना चाहता हूँ, सब मानते हैं तुझे, जानता नहीं कोई मगर, बस मैं तुझे जानना चाहता हूँ।
ज़िक्र तेरा करते फिरते हैं क्यों, जब तू मिलता ही नहीं, इस पहेली को मैं सुलझाना चाहता हूँ।
मंदिर में ढूँढा, मस्जिद में ढूँढा, ढूँढा हर एक निशाँ, तू रहता है कहाँ, ऐ ख़ुदा, बस इतना जानना चाहता हूँ।
हर सिम्त तुझे ढूँढा, हर दर पे दस्तक दी, क्या तू मेरे भीतर है, बस इतना जानना चाहता हूँ।
जब अपने आप से मिला, तेरी ही आहट सुनाई दी, अब मैं तुझे नहीं, बस मुझको ही जानना चाहता हूँ।
शनिवार, ३०/५/२०२६, ९:१२ AM
अजय सरदेसाई -मेघ
