तमन्ना भी है, मोसम भी,
तुम पास आओ कुछ हम भी।
सामने रखा है शिशा-ए-जिंदगी,
कुछ तुम पी लो, कुछ हम भी।
तुम पास आओ कुछ हम भी।
सामने रखा है शिशा-ए-जिंदगी,
कुछ तुम पी लो, कुछ हम भी।
वो दूर फलक पर एक सितारा,
उसे हम देखे, तुम भी।
क्या नाम था उसका पता नहीं,
हम भूल गए, क्या तुम भी?
वक्त बितता रहा, उम्र ढलती गई,
राहें बहुत थीं और बढ़ती गई।
किसी राह पर मंज़िल न मिली,
जुस्तजू मुझे भी थी, तुम्हें भी।
कुछ परिंदे घोंसला बना रहे,
तिनको की जरूरत उन्हें भी, हमें भी।
एक दिन वो घोंसला फना होगा,
जानते वो भी हैं, हम भी।
कुछ दिल के घाव थे जो भर गए,
जख्म फिर भी रह गए।
क्यों न वक्त पर उन्हें छोड़ दें,
हम भी और तुम भी।
शनिवार, १४/३/२६। , ११:४५ AM
अजय सरदेसाई -मेघ

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