प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Friday, 13 March 2026

तमन्ना भी है, मौसम भी




तमन्ना भी है, मोसम भी,
तुम पास आओ कुछ हम भी।
सामने रखा है शिशा-ए-जिंदगी,
कुछ तुम पी लो, कुछ हम भी।

वो दूर फलक पर एक सितारा,
उसे हम देखे, तुम भी।
क्या नाम था उसका पता नहीं,
हम भूल गए, क्या तुम भी?

वक्त बितता रहा, उम्र ढलती गई,
राहें बहुत थीं और बढ़ती गई।
किसी राह पर मंज़िल न मिली,
जुस्तजू मुझे भी थी, तुम्हें भी।

कुछ परिंदे घोंसला बना रहे,
तिनको की जरूरत उन्हें भी, हमें भी।
एक दिन वो घोंसला फना होगा,
जानते वो भी हैं, हम भी।

कुछ दिल के घाव थे जो भर गए,  
जख्म फिर भी रह गए।  
क्यों न वक्त पर उन्हें छोड़ दें,  
हम भी और तुम भी।

शनिवार, १४/३/२६। , ११:४५ AM 
अजय सरदेसाई -मेघ

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