प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Thursday, 12 March 2026

पत्ता पत्ता बुटा बुटा....


मुखड़ा
पत्ता–पत्ता, बूटा–बूटा
हाल हमारा जाने है।
जाने न जाने, गुल ही न जाने,
बाग़ तो सारा जाने है।

अंतरा १
इश्क़ होकर भी न जाने क्यों छुपाते हैं लोग,
किसी पर मरकर भी न जाने क्यों छुपाते हैं लोग।
किसी का नहीं है सहारा,
यहाँ तो कोई हमारा
राज़ कहाँ पहचाने है।

अंतरा २
हर धड़कन दिल की कहती है एक अफ़साना,
हर आह साँसों की सुनाती है इक फ़साना।
ख़ामोश है सारा नज़ारा,
करता बस यही इशारा—
दिल का मर्ज़ कोई न जाने है।

अंतरा ३
चाह कर भी अक्सर चाह नहीं जताते हैं लोग,
रातों की तन्हाई में अक्सर आँसू बहाते हैं लोग।
रौशन है सारा नज़ारा,
चराग़ों का आलम है सारा—
परवानों का जलना कौन जाने है।

गुरुवार, १२/३/२६ ३:३५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ


मिर-तकी-मिर से प्रेरित 🙏❤️

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