मुखड़ा
पत्ता–पत्ता, बूटा–बूटा
हाल हमारा जाने है।
जाने न जाने, गुल ही न जाने,
बाग़ तो सारा जाने है।
पत्ता–पत्ता, बूटा–बूटा
हाल हमारा जाने है।
जाने न जाने, गुल ही न जाने,
बाग़ तो सारा जाने है।
अंतरा १
इश्क़ होकर भी न जाने क्यों छुपाते हैं लोग,
किसी पर मरकर भी न जाने क्यों छुपाते हैं लोग।
किसी का नहीं है सहारा,
यहाँ तो कोई हमारा
राज़ कहाँ पहचाने है।
अंतरा २
हर धड़कन दिल की कहती है एक अफ़साना,
हर आह साँसों की सुनाती है इक फ़साना।
ख़ामोश है सारा नज़ारा,
करता बस यही इशारा—
दिल का मर्ज़ कोई न जाने है।
अंतरा ३
चाह कर भी अक्सर चाह नहीं जताते हैं लोग,
रातों की तन्हाई में अक्सर आँसू बहाते हैं लोग।
रौशन है सारा नज़ारा,
चराग़ों का आलम है सारा—
परवानों का जलना कौन जाने है।
गुरुवार, १२/३/२६ ३:३५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ
मिर-तकी-मिर से प्रेरित 🙏❤️

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