प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Wednesday, 13 May 2026

ख़्वाहिश




मिलने की है तुझे ये जो ख़्वाहिश, दिल से निकली है,
तुझसे खुलकर बातें करने की कोशिश, दिल से निकली है।।

दिल खोलकर तुझे दिखाने की ख़्वाहिश, दिल से निकली है,
ये मेरे सब्र की आख़िरी आज़माइश, दिल से निकली है।।

कल रात भर चाँद तकता रहा तुझे फलक से,
उस चाँद से मेरी जलन-ओ-रंजिश, दिल से निकली है।।

तेरी ख़ामोश नज़रों में जो इक हल्की सी बारिश है,
उसमें भीग जाने की ये ख़्वाहिश, दिल से निकली है।।

तेरे जाने के बाद भी तेरा एहसास फिर भी ठहरा है,
इस सूने दिल में फिर से धड़कने की कशिश, दिल से निकली है।।

तेरे धड़कनों की लरज़िश मुझे सुनाई देती है,
बेचैनी में डूबी ये हल्की सी ख़्वाहिश, दिल से निकली है।।

मिलो तो  मिरे  अनकहें  लफ़्जों  को भी सुनना 'मेघ',
मेरी हर लरज़ती धड़कन की गुज़ारिश, दिल से निकली है।।

बुधवार, १३ मई २०२६ , ५:३५ PM
अजय सरदेसाई 'मेघ'

हृदायातुन उमटली असेल...





कदाचित ती त्याचीच ख्वाहिश,
हृदयातून उमटली असेल।
ही जीवनाची आर्त फरमाइश,
हृदयातून उमटली असेल।।

झऱ्याची ती छमछम धून,
किंवा सागराची शांतता गहिरी,
ती सृजनाची सुंदर नुमाइश,
हृदयातून उमटली असेल।।

डोळ्यांत दाटलेली ओल,
ओठांवरील ती निःशब्दता,
अंतरीय वेदनेची पैदाइश,
हृदयातून उमटली असेल।।

मातीतून आलो सारे आपण,
मातीतच विरून जाणारे,
ही सनातन जी रवाइश,
हृदयातून उमटली असेल।।

आईच्या त्या प्रार्थना अजुनी,
मनात घुमत राहतात,
त्या आर्त प्रार्थनांची जुंबिश,
हृदयातून उमटली असेल।।

शून्यात हरवल्यागत वाटले,
ते पुन्हा  गवसले कसे ‘मेघ’,
ती परतीच्या प्रवासाची ख्वाहिश,
हृदयातून उमटली असेल।।

बुधवार, १३/५/२६, २:४५ PM
अजय सरदेसाई ‘मेघ'

दिल से निकली होगी...





ये शायद उसकी ख़्वाहिश है, दिल से निकली होगी।
ये ज़िंदगी की फ़रमाइश है, दिल से निकली होगी।।

झरने की वो छमछम हो, या सागर की शांतता,
ये उसके सृजन की नुमाइश है, दिल से निकली होगी।।

आँखों में जो नमी है, होंठों पे जो ख़ामोशी,
ये किसी दर्द की पैदाइश है, दिल से निकली होगी।।

मिट्टी से उठे हम सब, मिट्टी में मिल जाएँगे,
ये उसी की रवाइश है, दिल से निकली होगी।।

माँ की जो दुआएँ थीं, अब भी कहीं गूँजती हैं,
ये रूह की सदाइश है, दिल से निकली होगी।।

शून्य में जो खो जाएँ, वो खोते कहाँ हैं ‘मेघ’,
ये जो वापसी की ख़्वाहिश है, दिल से निकली होगी।।

बुधवार, १३/५/२६ , १:४८ PM
अजय सरदेसाई  ‘मेघ’

अस्तित्व का रहस्य


 

झरना, नदी, सागर, महासागर — सब तो एक ही पानी हैं,

फिर क्यों छमछम, कलकल, घर्रघर्र, ॐ — अलग-अलग कहानी हैं?

मेघ अलग, जल अलग, दोनों के अलग विधान हैं,
फिर क्यों दोनों के आँचल में — एक ही नीला आसमान है?

मिट्टी, पाषाण, वन, पर्वत — सबकी अपनी पहचान है,
फिर क्यों हर कण के भीतर — एक ही मौन निशान है?

सूरज, चंदा, दीपक, जुगनू — सबकी अपनी ज्योति है,
फिर क्यों हर उजियारे में — वही एक लौ होती है?

देह अलग, मन अलग, अलग सभी की माया है,
फिर क्यों रोते क्षण में — हर आँसू खारा पाया है?

जन्म अलग, पथ अलग, अलग सभी की यात्राएँ हैं,
फिर क्यों अंतिम श्वास में — सब शून्य में खो जाएँ हैं?

शायद यही रहस्य है — जिसे सब "अस्तित्व" कहते आए हैं,
एक ही तत्त्व से उठकर हम — फिर उसी में समाए हैं।।

बुधवार, १३/५/२६ , ११:०० AM
अजय सरदेसाई -मेघ