प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Wednesday, 22 July 2026

अवशिष्ट


 

शब्द न उरले करण्या प्रेम व्यक्त,

का, कसे, केव्हा झाले शब्द रिक्त!


शब्द झिजले, प्रेम, प्रेम ना उरले,

तो उन्माद सरला, ते आकर्षण न उरले.


जीवनाची संध्याकाळ आली जवळ,

जे उरले अवशिष्ट, ते स्मरण केवळ.


ना खंत उरली, ना उरली आस,

फक्त उरला एक शांत, मोकळा श्वास.


राहिला मनात कुठेतरी एक विचार घन,

एकदा प्रेम केले होते उत्कट, हेच खरे धन.


बुधवार, २२/७/२६, १२:४५ PM

अजय सरदेसाई – मेघ

Tuesday, 21 July 2026

सजल नयन निरोप तुज आई


 

सजल नयन निरोप तुज आई
सजल नयन निरोप तुज आई

आज स्मरते ती अंगाई तुझी आई
तू गातसे जी निजवण्या मज आई
डोक्यावर मायेचा फिरवून हात
ऐकवीन म्हणतो तुला ती आई
परी तू आज गेली चिर निद्रेत आई.

सजल नयन निरोप तुज आई

शाळेत सोडाया येसी तू आई
पुस्तकांत भरसी स्वप्न नवी आई
कष्टाचे घाम गाळून तुझे
मोठा केलेस मला घडवुनी आई
परी तू आज गेली चिर निद्रेत आई.

सजल नयन निरोप तुज आई

माझ्या यशात तुझे हसू खुलते आई
सुख माझे तुझ्या डोळ्यांत दिसते आई
कधी न सांगिले दुःख तुझे मज
आनंदातच जगली आयुष्य आई
परी तू आज गेली चिर निद्रेत आई.

सजल नयन निरोप तुज आई

आज घरात स्तब्ध शांतता आई
तुझ्याविना रितेपण दाटते आई
संस्कारांचा वसा तुझा घेऊन
जगेन पुढे मी नाव तुझे आई
परी तू आज गेली चिर निद्रेत आई.

सजल नयन निरोप तुज आई

मागणे माझे आज परमेश्वरास आई
माझ्या पोटी पुढला जन्म मिळो तुज आई,
तू मुलगा नी मी आई तुझी व्हावे, आई
सांग तुही हेच देवाला, शपथ माझी तुला आई.

सजल नयन निरोप तुज आई
सजल नयन निरोप तुज आई


मंगळवार, २१/७/२६ , १२:४५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Saturday, 18 July 2026

जरुरी है अभी


 

अपनी एक और मुलाक़ात ज़रूरी है अभी,

अपनी और गहरी पहचान ज़रूरी है अभी।


अजनबियों से प्यार यूं ही कभी करते नहीं,

अपना थोड़ा और परिचय होना ज़रूरी है अभी।


दिल की बातें लफ़्ज़ों में कहां आती हैं सदा,

कुछ ख़ामोशी का भी बयान ज़रूरी है अभी।


फूल यूं ही नहीं खिलते बस मौसम के आने से,

प्यार की थोड़ी बरसात ज़रूरी है अभी।


अपनी एक और मुलाक़ात ज़रूरी है अभी,

अपनी और गहरी पहचान ज़रूरी है अभी।


रास्ते ख़ुद-ब-ख़ुद मंज़िल नहीं बन जाते कभी,

साथ चलने का इरादा ज़रूरी है अभी।


चाहें कितनी भी हों, वक़्त मांगती है ये राह,

थोड़ा सब्र, थोड़ी बात ज़रूरी है अभी।


तुम बस मुझसे अभी प्यार का वादा लो,

और कुछ नहीं, प्यार का इत्मीनान तो हो अभी।


अपनी एक और मुलाक़ात ज़रूरी है अभी,

अपनी और गहरी पहचान ज़रूरी है अभी।


शनिवार, १८/७/२६। , ११:०० AM

अजय सरदेसाई -मेघ

Friday, 17 July 2026

शोध आकाशात


 


अनंत तारे, नेमका माझा कोणता,आकाशात?

का त्याला उगवायचे आहे अजुन, आकाशात?


हा त्याचा, तो ह्याचा,कळते ना,पाहुन आकाशात 

ती रात्र येईल कधी, हा माझा, मी म्हणेन,पाहुन आकाशात?


कधी कधी आकाश पाण्यात अलवार उतरते,

अमर्याद नसते, मी उतरतो शोधत तारा त्या आकाशात!


एकदा ती मला पाहुन लाजत हसली,चांदणी,

तेव्हा कळलं,तारे नव्हते माझे,चांदणी होती, आकाशात.


"मेघ" म्हणतो, तारा शोधणे संपले आता,

एक हसरी चांदणीच माझे विश्व झाली, आकाशात.


शुक्रवार, १७/७/२६ , ४:१५ PM

अजय सरदेसाई -मेघ

Wednesday, 15 July 2026

नक्षत्र मिळते का पाहु



 

पुळणीवर चालताना, आकाशातील नक्षत्रे पाहू,
तुझे नी माझे जुळणारे, नक्षत्र मिळते का पाहू।

लाटांच्या स्पर्शाने पाउले भिजली दोघांची,
ओल्या वाळूत ती एकमेकांत मिसळून पाहू।

तुझ्या केसांत अडकला खट्याळ वारा खारा,
त्या वाऱ्याच्या तालावर जरा धुंद होऊन पाहू।

पुळणीवर चालताना, आकाशातील नक्षत्रे पाहू,
तुझे नी माझे जुळणारे, नक्षत्र मिळते का पाहू।

बोलायचे आहे तुझ्याशी, पण शब्दच अपुरे,
नजरेच्याच भाषेत सारे, आपण बोलून पाहू।

रात्र सरावी न इतक्यात, थांबावा हा क्षण आता,
खांद्यावर टेकून अशीच जरा, तू विसाव पाहू।

पुळणीवर चालताना, आकाशातील नक्षत्रे पाहू,
तुझे नी माझे जुळणारे, नक्षत्र मिळते का पाहू।

या नक्षत्रांच्याही पल्याड, एक आकाश शोधू,
एकमेकांचं ते आकाश, आपणच होऊन पाहू।

बुधवार, १५/७/२६ , १०:३० AM
अजय सरदेसाई -मेघ

Sunday, 12 July 2026

आस ये थी, कुछ काम मिले


बस आस ये थी कि कुछ काम मिले,
तेरे शहर में सिर्फ़ इल्ज़ाम मिले।

कुछ दर्द भी मिले ज़िंदगी भर के लिए,
और न चाहते हुए भी कुछ नाम मिले।

सुना था शहर ये तेरा कभी रुकता नहीं,
मगर जो भी मिले, यहाँ मुझे नाकाम मिले।

ढूँढ़ा बहुत यहाँ मैंने शोहरत को,
यहाँ दौलतमंद सारे बदनाम मिले।

गाव में मेरे जिंदगी छलकती थी,
यहॉं मुझे न कोई ऐसे मकाम मिले।

आख़िर बहुत सोचकर मे वापिस गाव लौटा,
उफ़! देख़ा तो हर घर में शहर के अंजाम मिले।

बस इतनी सी है  फ़रियाद 'मेघ',
कहीं तो दिल को सुकूं का जाम मिले।

सोमवार, १३/७/२६ ,१०:४० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Friday, 10 July 2026

ढूँढ के देखो...( सुफी तरन्नुम)

 


हम अगर अपने घर में न मिलें,तो तन्हाइयों से पूछो,
हम उम्मीद के हर किरण में मिलेंगे,तुम ढूँढ के देखो।

शगुफ़्ता किसी कली में नहीं,तो और कहाँ होगी,
हर कली में ये मुस्कान मिलेगी,तुम बाग़ में देखो।

बाहर जो दुनिया है,वह बस एक छलावा है,
गर असली देखने की ख़्वाहिश है,अंदर झाँक के देखो।

आँखें जो देखती हैं,अक्सर सच होता नहीं है,
सच जानने की चाहत है?तो दिल खोलकर देखो।

ज़िंदगी वो शय है,जिसे समझना है मुश्किल,
गर समझना चाहते ही हो,तो उसे जी कर देखो।

किसी गैर से नफ़रत करना,औबड़ी बात नहीं,
अगर कुछ करना है तो,गैर को चाहकर देखो।

शनिवार, ११/७/२६ , ११:३० AM
अजय सरदेसाई -मेघ 

कोशिश न कर (सुफी तरन्नुम)


हम तो हर इम्तिहान से गुज़रे हैं,
तू हमें और आज़माने की कोशिश न कर।

ज़िंदगी ख़ुद ही एक आज़माइश है,
तू जीना सिखाने की कोशिश न कर।

हर सफ़र की धूप से वाकिफ हैं हम,
तू हमें साया दिखाने की कोशिश न कर।

दर्द अपना हमने ख़ुद ही सह लिया है,
तू मरहम लगाने की कोशिश न कर।

हर सवाल का जवाब हम दे चुके हैं,
तू फिर से सुनाने की कोशिश न कर।

 इस जहान के लिए कब से फ़ना हो चुके हम,
तू हमें वापस बुलाने की कोशिश न कर।

शनिवार
, ११/७/२६ , ९:५० AM
अजय सरदेसाई -मेघ 

Wednesday, 8 July 2026

जा रे पिया ( राग यमन)

 

स्थायी: ( मुखड़ा)
ओ रे पिया, पिया, ओ मोरे पिया
जा रे, जा रे, तू जा रे मोरे पिया॥

( दुल्हन - अंतरा १)
सेहरा उतरा ना था अभी तक,
बजी रणभेरी रे।
मेहंदी का रंग अभी ना उतरा,
कर्तव्य के आगे प्रेम भी हारे॥

(दुल्हा अंतरा २)
धीरज धर तू, साहस रखियो,
मन में मिलन की आस धरे।
जीत के लौटूँ, वचन है मेरा,
मिलन की आस कभी ना हारे॥

( दुल्हन अंतरा ३)
देश-धरम का बुलावा माना,
शीश झुकाया रे।
बाट जोहूँ मैं, दिन गिनूँ पल-पल,
प्रतीक्षा के आगे समय भी हारे॥

( दुल्हा-दुल्हन  अंतरा ४)
जनम-जनम का साथ हमारा,
फिर मिलेंगे रे।
प्रेम लौटे फिर जनम लेकर,
प्रेम के आगे नियति भी हारे॥

 बुधवार, ८/७/२०२६ , ०१:१० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Sunday, 5 July 2026

घन-घन बाजत घनघोर बदरा ( बंदीश)

घन घन बाजत घनघोर बदरा,
चमचम दामिनी लखलखत बैरी।
सनसनन पवन उड़त सैरभैर,
सावन का संदेशा कहत रहो॥

कलेस भी करे है, प्रेम भी भयो है,
बरसत नीर मोरे मन को हर्यो है।
नीर भिगोयो मोहे सिर से पाँव तक,
फिर पवन मोहे देख-देख छले है॥

पवन बने कबहूँ मलय सुगंधित,
कबहूँ बने ये विष सम बैरी।
साजन की आस दिखाए झूठी,
फिर तरसाए, मन करे न धैरी॥

अरी पवन, अब रुक जा मेरी,
क्यों करे तू इतनी मनमानी।
पिया लौं जो बात पहुंचाऊं,
तोहे न छोड़िहैं मोरे सजनवा रे॥

रविवार, ५/७/२६ , १०:०० PM 
अजय सरदेसाई -मेघ