बस आस ये थी कि कुछ काम मिले,
तेरे शहर में सिर्फ़ इल्ज़ाम मिले।
तेरे शहर में सिर्फ़ इल्ज़ाम मिले।
कुछ दर्द भी मिले ज़िंदगी भर के लिए,
और न चाहते हुए भी कुछ नाम मिले।
सुना था शहर ये तेरा कभी रुकता नहीं,
मगर जो भी मिले, यहाँ मुझे नाकाम मिले।
ढूँढ़ा बहुत यहाँ मैंने शोहरत को,
यहाँ दौलतमंद सारे बदनाम मिले।
गाव में मेरे जिंदगी छलकती थी,
यहॉं मुझे न कोई ऐसे मकाम मिले।
आख़िर बहुत सोचकर मे वापिस गाव लौटा,
उफ़! देख़ा तो हर घर में शहर के अंजाम मिले।
बस इतनी सी है फ़रियाद 'मेघ',
कहीं तो दिल को सुकूं का जाम मिले।
सोमवार, १३/७/२६ ,१०:४० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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