प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Sunday, 12 July 2026

आस ये थी, कुछ काम मिले


बस आस ये थी कि कुछ काम मिले,
तेरे शहर में सिर्फ़ इल्ज़ाम मिले।

कुछ दर्द भी मिले ज़िंदगी भर के लिए,
और न चाहते हुए भी कुछ नाम मिले।

सुना था शहर ये तेरा कभी रुकता नहीं,
मगर जो भी मिले, यहाँ मुझे नाकाम मिले।

ढूँढ़ा बहुत यहाँ मैंने शोहरत को,
यहाँ दौलतमंद सारे बदनाम मिले।

गाव में मेरे जिंदगी छलकती थी,
यहॉं मुझे न कोई ऐसे मकाम मिले।

आख़िर बहुत सोचकर मे वापिस गाव लौटा,
उफ़! देख़ा तो हर घर में शहर के अंजाम मिले।

बस इतनी सी है  फ़रियाद 'मेघ',
कहीं तो दिल को सुकूं का जाम मिले।

सोमवार, १३/७/२६ ,१०:४० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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