प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Friday, 10 July 2026

ढूँढ के देखो...( सुफी तरन्नुम)

 


हम अगर अपने घर में न मिलें,तो तन्हाइयों से पूछो,
हम उम्मीद के हर किरण में मिलेंगे,तुम ढूँढ के देखो।

शगुफ़्ता किसी कली में नहीं,तो और कहाँ होगी,
हर कली में ये मुस्कान मिलेगी,तुम बाग़ में देखो।

बाहर जो दुनिया है,वह बस एक छलावा है,
गर असली देखने की ख़्वाहिश है,अंदर झाँक के देखो।

आँखें जो देखती हैं,अक्सर सच होता नहीं है,
सच जानने की चाहत है?तो दिल खोलकर देखो।

ज़िंदगी वो शय है,जिसे समझना है मुश्किल,
गर समझना चाहते ही हो,तो उसे जी कर देखो।

किसी गैर से नफ़रत करना,औबड़ी बात नहीं,
अगर कुछ करना है तो,गैर को चाहकर देखो।

शनिवार, ११/७/२६ , ११:३० AM
अजय सरदेसाई -मेघ 

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