हम अगर अपने घर में न मिलें,तो तन्हाइयों से पूछो,
हम उम्मीद के हर किरण में मिलेंगे,तुम ढूँढ के देखो।
हम उम्मीद के हर किरण में मिलेंगे,तुम ढूँढ के देखो।
शगुफ़्ता किसी कली में नहीं,तो और कहाँ होगी,
हर कली में ये मुस्कान मिलेगी,तुम बाग़ में देखो।
बाहर जो दुनिया है,वह बस एक छलावा है,
गर असली देखने की ख़्वाहिश है,अंदर झाँक के देखो।
आँखें जो देखती हैं,अक्सर सच होता नहीं है,
सच जानने की चाहत है?तो दिल खोलकर देखो।
ज़िंदगी वो शय है,जिसे समझना है मुश्किल,
गर समझना चाहते ही हो,तो उसे जी कर देखो।
किसी गैर से नफ़रत करना,औबड़ी बात नहीं,
अगर कुछ करना है तो,गैर को चाहकर देखो।
शनिवार, ११/७/२६ , ११:३० AM
अजय सरदेसाई -मेघ

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