प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Tuesday, 1 September 2026

सुलह


आँखें डबडबा गईं रौशनी से,
सहर ने शायद शरारत की मुझसे।

मैं अँधेरों में रहने का आदी हूँ,
आफ़ताब ने छेड़खानी की मुझसे।

आँखों की शबनम को सँभाल लिया मैंने,
कली की ओस मगर सही न गई मुझसे।

हवा ने भी छुआ तो लरज़ उठा दिल,
ये नाज़ुक-मिज़ाजी कहाँ ले चली मुझसे।

धूप का एक टुकड़ा गिरा जो आँगन में,
बरसों पुरानी ख़ामोशी दरक गई मुझसे।

अब चाँद से भी लगती है कुछ तपिश-सी,
शायद हर उजाला यही कह गया मुझसे।

सितारों की चिलमन में छुप के देखा,
मगर एक किरण भी न छुपी मुझसे।

शजर की परछाई में पनाह ढूँढी,
मगर पत्तों ने धोखा किया मुझसे।

अब सोचता हूँ बुझा दूँ हर एक दीया,
मगर दिल की लौ भी तो बुझी न मुझसे।

फिर सोचा शायद यही तो मंज़िल थी,
अँधेरा तो बस खेल रहा था मुझसे।

रौशनी से भागकर मैं जाऊँ कहाँ,
वो ख़ुद मेरे अंदर छुपी थी मुझसे।

अब आँखें डबडबाती नहीं उजाले से,
ये सुलह शायद ख़ुद रौशनी ने की मुझसे।

मंगलवार, १/९/२६ , ६:०० PM
अजय सरदेसाई -मेघ