आँखें डबडबा गईं रौशनी से,
सहर ने शायद शरारत की मुझसे।
सहर ने शायद शरारत की मुझसे।
मैं अँधेरों में रहने का आदी हूँ,
आफ़ताब ने छेड़खानी की मुझसे।
आँखों की शबनम को सँभाल लिया मैंने,
कली की ओस मगर सही न गई मुझसे।
हवा ने भी छुआ तो लरज़ उठा दिल,
ये नाज़ुक-मिज़ाजी कहाँ ले चली मुझसे।
धूप का एक टुकड़ा गिरा जो आँगन में,
बरसों पुरानी ख़ामोशी दरक गई मुझसे।
अब चाँद से भी लगती है कुछ तपिश-सी,
शायद हर उजाला यही कह गया मुझसे।
सितारों की चिलमन में छुप के देखा,
मगर एक किरण भी न छुपी मुझसे।
शजर की परछाई में पनाह ढूँढी,
मगर पत्तों ने धोखा किया मुझसे।
अब सोचता हूँ बुझा दूँ हर एक दीया,
मगर दिल की लौ भी तो बुझी न मुझसे।
फिर सोचा शायद यही तो मंज़िल थी,
अँधेरा तो बस खेल रहा था मुझसे।
रौशनी से भागकर मैं जाऊँ कहाँ,
वो ख़ुद मेरे अंदर छुपी थी मुझसे।
अब आँखें डबडबाती नहीं उजाले से,
ये सुलह शायद ख़ुद रौशनी ने की मुझसे।
मंगलवार, १/९/२६ , ६:०० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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