प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Monday, 31 August 2026

इश्क़


चाहत का दावा तो सभी करते हैं,जान मगर कहाँ फ़िदा करते हैं।

घूँट पीकर भी ज़हर का अक्सर,इश्क़ वाले कहाँ मरा करते हैं।

दिल को रखकर हथेली पर अपने,लोग फिर भी कहाँ डरा करते हैं।

जो न पाएँ कभी ख़ुशी अपनी,हम उन्हीं के लिए दुआ करते हैं।

दर्द जितना भी हो नसीबों में,इश्क़ वाले कहाँ गिला करते हैं।

ज़ख़्म अपनों से मिल भी जाएँ तो,फिर भी हम उनसे बस वफ़ा करते हैं।

जिसको खोकर भी भूलना चाहें,उसकी यादें सदा रखा करते हैं।

इश्क़ में हारना भी जीत है यारो,इश्क़ वाले यही कहा करते हैं।

मौत आए तो आए इश्क़ में हम,ज़िंदगी को क़ज़ा करते हैं।

'मेघ' ये कैसी अजब मोहब्बत है,लोग जीते हुए मरा करते हैं।

सोमवार, ३१/८/२६ , ७:१८ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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