दुनिया से सभी जाएँगे, बुरे भी, भले भी,
साथ ज़िंदगी का खोएँगे, बुरे भी, भले भी।
साथ ज़िंदगी का खोएँगे, बुरे भी, भले भी।
ज़िंदगी ने देखे जितने, ख़्वाब सभी टूटेंगे,
आज हँसें जो कल रोएँगे, बुरे भी, भले भी।
वक़्त एक दिन सबका हिसाब माँगेगा यहाँ,
आँसू सभी बहाएँगे, बुरे भी, भले भी।
मिट्टी में मिलेंगे सब, न ऊँच रहे न नीच,
इक रोज़ फ़ना सब होंगे, बुरे भी, भले भी।
चाहे जो भी हो नाम-ओ-निशाँ इस जहाँ में,
इक दिन तो भुलाए जाएँगे, बुरे भी, भले भी।
‘मेघ’ इतना गुरूर क्यों, ये ज़िंदगी दो दिन की है,
आख़िर ख़ाक में मिल जाएँगे, बुरे भी, भले भी।
शनिवार, २९/८/२६ , ९:२० AM
अजय सरदेसाई -मेघ

No comments:
Post a Comment