दिल में कोई अनकही सी तिश्नगी सी हो,
हर ख़ुशी के पीछे कोई ख़ामोशी सी हो।
हर ख़ुशी के पीछे कोई ख़ामोशी सी हो।
दिखती नहीं तुम, एक छिपी परछाईं जैसी हो,
ख़्वाब हो, ख़्वाहिश हो, कविता हो—कौन हो?
पास नहीं फिर भी हर पल पास लगती हो,
साँसों में बसी कोई ख़ुशबू सी हो।
नाम नहीं मालूम, चेहरा भी अनजान है,
फिर भी दिल को क्यों इतनी पहचानी सी हो?
मैं ख़ुद से पूछूँ—ये कैसी तलब है मेरी,
तुम हक़ीक़त हो, या कोई कहानी सी हो?
शनिवार, १५/८/२६, ७:०० PM
अजय सरदेसाई - मेघ

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