कैसा सफ़र है, मंज़िल से राहगर बेख़बर है,
मैकदों से भरा शहर है, मगर बशर बेख़बर है।
मैकदों से भरा शहर है, मगर बशर बेख़बर है।
किसे ढूँढ़ता रहा ता-उम्र, किसे मालूम है,
जिसे अपना समझा था, वही रहबर बेख़बर है।
दरख़्तों ने तो मौसम की ख़बर रखी है अब तक,
मगर अपनी ही जड़ों से हर शजर बेख़बर है।
जाम हाथों में लिए बैठे हैं प्यासे सारे रिंद,
मैकदा आबाद है, फिर भी साक़ी बेख़बर है।
रास्ते ख़त्म हो जाएँ, फिर कहाँ जाए मुसाफ़िर,
जाने क्यों मंज़िल से अब तक मेरी डगर बेख़बर है।
मेघ, शायद राज़-ए-हस्ती यही है आख़िरकार—
जो समझता है ख़ुद को, वो ही रहबर बेख़बर है।
शुक्रवार, २८/८/२६, ११:३० PM
अजय सरदेसाई — मेघ

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