अल्फ़ाज़ तेरे यूँ थे कि हम टूटे, कितने भरम, कितने दिल टूटे।
रिंद से न पूछो दिल की तड़प, जब सामने मय के पैमाने टूटे।
फ़ुरकत इतनी लंबी न कर, कि मिलने के हौसले टूटे।
सर पे कफ़न ले चले हैं उस जानिब, अब चाहे दिल टूटे या बदन टूटे।
मेघ, अब किस बात का शिकवा करें, कितने अक्स छूटे, कितने आईने टूटे।
शुक्रवार, २८/८/२६ — ११:११ AM अजय सरदेसाई — मेघ

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