थी एक कली बड़ी नाज़ुक-सी,
पत्तों के बीच थोड़ी सहमी-सी,
ओस ज़रा-सी क्या पी ली उसने,
वह खिल गई एक गुलशन-सी।
पत्तों के बीच थोड़ी सहमी-सी,
ओस ज़रा-सी क्या पी ली उसने,
वह खिल गई एक गुलशन-सी।
कल तक थी जो ख़ामोश-सी,
अपने ही डर में सिमटी-सी,
छू गई किरण जब भोर की उसको,
महक उठी फिर मधुबन-सी।
हवा चली तो पंखुड़ियाँ बोलीं,
बिखरी ख़ुशबू कुछ अनकही-सी,
जिसको समझा था अंत सफ़र का,
वह निकली नई शुरुआत-सी।
धूप मिली तो रंग निखरने लगे,
रात गई तो आँखें खुलीं,
एक बूँद ने इतना भर दिया,
सूनी शाख़ पे सौ ख़ुशियाँ खिलीं।
जीवन भी कुछ ऐसा ही है,
कभी धूप, कभी बदली-सी,
बस प्रेम की ओस ज़रा मिल जाए,
रूह खिल उठे उस कली-सी।
कल जो थी सहमी, आज वही तो
बन बैठी है ख़ुशबू बनकर,
एक नन्हीं-सी ओस की बूँद ने
जीना सिखला दिया मुस्काकर।
सोमवार, ३१/८/२६, ०२:०२ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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