चाहत का असर अब कुछ मद्धम हो रहा है,
मेरी दीवानगी का खुमार कम हो रहा है।
मेरी दीवानगी का खुमार कम हो रहा है।
ज़ख्मों का वो तूफ़ान भी पुरसुकून हो रहा है,
जो दर्द था कभी तेज़, अब नर्म हो रहा है।
तेरी याद का जो भँवर था, अब मिट रहा है,
दिल का वो पुराना वहम भी कम हो रहा है।
तूने जो न दिया कभी, वो माँगना छोड़ दिया,
शायद मुझ पर अक़्ल का करम हो रहा है।
टूटे हुए दिल पर अब वक़्त का हाथ है,
हर ज़ख्म धीरे-धीरे मरहम-सा हो रहा है।
शिकवों की किताबों को कब का बंद कर दिया,
अब ख़ुद से ही मेरा सलाम हो रहा है।
"मेघ" जो बरसता था, अब थमने लगा है वो,
इश्क़ की इस ज़मीन पर मौसम नर्म हो रहा है।
गुरुवार, ११ जून २०२६ | ११:११ AM
अजय सरदेसाई– मेघ

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