प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Thursday, 11 June 2026

चाहत का असर...


 

चाहत का असर अब कुछ मद्धम हो रहा है,
मेरी दीवानगी का खुमार कम हो रहा है।

ज़ख्मों का वो तूफ़ान भी पुरसुकून हो रहा है,
जो दर्द था कभी तेज़, अब नर्म हो रहा है।

तेरी याद का जो भँवर था, अब मिट रहा है,

दिल का वो पुराना वहम भी कम हो रहा है।

तूने जो न दिया कभी, वो माँगना छोड़ दिया,

शायद मुझ पर अक़्ल का करम हो रहा है।

टूटे हुए दिल पर अब वक़्त का हाथ है,

हर ज़ख्म धीरे-धीरे मरहम-सा हो रहा है।

शिकवों की किताबों को कब का बंद कर दिया,

अब ख़ुद से ही मेरा सलाम हो रहा है।

"मेघ" जो बरसता था, अब थमने लगा है वो,

इश्क़ की इस ज़मीन पर मौसम नर्म हो रहा है।

गुरुवार, ११ जून २०२६ | ११:११ AM

अजय सरदेसाई– मेघ

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