मैं घर बना रहा हूँ, तू उसकी दीवारें बना,
हर दीवार से झाँकने, एक झरोखा बना।
धूप जब थक के बैठे, उसे भी छाँव मिले,
आँगन में प्यार का कोई, शजर पुराना बना।
रात उतरे तो उजालों की कमी महसूस न हो,
चाँद की राह दिखाता, तू कोई दीपक बना।
सिर्फ़ ईंटों से मकाँ, घर नहीं बन पाता,
रिश्तों की गर्माहट का, कोई कोना भी बना।
मैं नींव रख रहा हूँ, तू ऊपर छत चढ़ा,
मेरे हर ख़्वाब को, तू दीवार-सा आसरा बना।
और यदि तू ही बसे, इस दिल के मकाँ में कभी,
दरवाज़ा नहीं, बस एक झरोखा बना।
बुधवार, १०/६/२६, ३:०० PM
अजय सरदेसाई — मेघ 🌧️

No comments:
Post a Comment