तुम हसीं — मैं मुस्ताक़,
तुम अख़्लाक़ — मैं ग़ुस्ताख़।
इश्क़ है सादिक़, ये बस इत्तिफ़ाक़ —मैं ग़ुस्ताख़।
तेरी आँखों से बरसा नूर-ए-हया शबनम,
आँखों से पी लिया, हुआ तिश्नाक़ —मैं ग़ुस्ताख़।
तेरे सुख़न की सुर्ख़ी-ए-लब-ओ-नमी,
बस ख़्वाबों में चूमा, हुआ बे-अख़्लाक़ —मैं ग़ुस्ताख़।
तेरी ख़ामोशी सुनता रहा ख़्वाबों में,
तेरे चेहरे का नूर हुआ इशराक़ — मैं ग़ुस्ताख़।
“मेघ” चुप है, मगर दिल में तिरा तराना है,
दुनिया को क्या मालूम ये इश्तिराक़ —मैं ग़ुस्ताख़।
✍🏻
अजय सरदेसाई ‘मेघ’
रविवार · १४/९/२५ · ९:०३ PM
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अख़्लाक़ = अच्छे संस्कारों वाला, शिष्ट और आदर्श व्यवहार
करने वाला व्यक्ति
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मुस्ताक़ = इच्छुक, आतुर
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इत्तिफ़ाक़ = संयोग, घटना
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तिश्नाक़ = प्यासा, आतुर
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बे-अख़्लाक़ = बदतमीज़, बिन-शिष्टाचार
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इशराक़ = सुबह का उजाला, रौशनी का फैलना
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इश्तिराक़ = साझेदारी, साझापन
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अख़्लाक़ = अच्छे संस्कारों वाला, शिष्ट और आदर्श व्यवहार
करने वाला व्यक्ति

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