प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Sunday, 14 September 2025

तुम हसीं — मैं मुस्ताक़




तुम हसीं — मैं मुस्ताक़,

तुम अख़्लाक़ — मैं ग़ुस्ताख़।

इश्क़ है सादिक़, ये बस इत्तिफ़ाक़ —मैं ग़ुस्ताख़।


तेरी आँखों से बरसा नूर-ए-हया शबनम,

आँखों से पी लिया, हुआ तिश्नाक़ —मैं ग़ुस्ताख़।


तेरे सुख़न की सुर्ख़ी-ए-लब-ओ-नमी,

बस ख़्वाबों में चूमा, हुआ बे-अख़्लाक़ —मैं ग़ुस्ताख़।


तेरी ख़ामोशी सुनता रहा ख़्वाबों में,

तेरे चेहरे का नूर हुआ इशराक़ — मैं ग़ुस्ताख़।


“मेघ” चुप है, मगर दिल में तिरा तराना है,

दुनिया को क्या मालूम ये इश्तिराक़ —मैं ग़ुस्ताख़।


✍🏻

अजय सरदेसाई ‘मेघ’

रविवार · १४/९/२५ · ९:०३ PM

 

·        अख़्लाक़ = अच्छे संस्कारों वाला, शिष्ट और आदर्श व्यवहार करने वाला व्यक्ति

·        मुस्ताक़ = इच्छुक, आतुर

·        इत्तिफ़ाक़ = संयोग, घटना

·        तिश्नाक़ = प्यासा, आतुर

·        बे-अख़्लाक़ = बदतमीज़, बिन-शिष्टाचार

·        इशराक़ = सुबह का उजाला, रौशनी का फैलना

·        इश्तिराक़ = साझेदारी, साझापन

·        अख़्लाक़ = अच्छे संस्कारों वाला, शिष्ट और आदर्श व्यवहार करने वाला व्यक्ति

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