प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Thursday, 19 February 2026

दीवार-ओ-दर से मिलती है क्या शक्ल मेरी

दीवार-ओ-दर से मिलती है क्या शक्ल मेरी,
वो राह से गुज़रती है, देखती नहीं जान मेरी।

माना कि उसका रंग-ओ-रूप बड़ा क़ामिल,
ख़ुदा कसम, शक्ल अपनी भी नहीं बुरी।

दिल से यूँ लिपट गई हैं ख़ामोशियाँ तेरी,
तन्हाइयाँ ही लगती हैं अब हमसफ़र मेरी।

बिख़र गया हूँ फिर भी, टूटा नहीं हूँ मैं,
ख़ुद अपनी ही हिफ़ाज़त में है अब रूह मेरी।

‘मेघ’ रूह की हिफ़ाज़त में उम्र कट गई,
दुनिया रही न रही, बाक़ी रही ज़ात मेरी।

गूरुवार , १९/२/२६ , ०१:११ AM
अजय सरदेसाई -मेघ

Saturday, 7 February 2026

दूर होते रहे


तेरी आगोश-ए-याद में रात भर रोते रहे,

सुबह हुई फिर भी उसी ख़ुमार में सोते रहे।


        उम्र भर तलाश-ए-मंज़िल की होती रही,

        तुम ही मंज़िल थे, तेरी तलाश में फिरते रहे।


राह-ए-इश्क़ बड़ी पेचीदा थी, सनम,

तुम तक पहुँचने को दर-ब-दर भटकते रहे।


        कारवाँ-ए-इश्क़ सामने से गुज़र गया,

        हम खाली हाथ बस खड़े देखते रहे।


फ़लक पर चाँद के दीदार सबको हुए,

हम अपने चाँद के दीदार को तरसते रहे।


        मेघ’ किस्मत की धूप में यूँ जलते रहे क्या कहें,

        वो ख़्वाबो में पास, हकिकत में हमसे दूर होते रहे।

 

शुक्रवार, ३०/१/२६ ,१२:४५ PM

अजय सरदेसाई -मेघ


Wednesday, 17 December 2025

अधूरा रिश्ता

 



 

मतला


तेरी ज़िंदगी में होना कुछ एहसान नहीं,

जैसे उम्र-दराज़ दरख़्त पे हर पत्ता हरा नहीं।

 

अक्सर ये सोचता हूँ, ये कैसा रिश्ता बना,

जो महसूस तो होता है, मगर पूरा अपना नहीं।

 

मौजूद है हर लम्हा, एहसास मगर कम ही रहा,

लगता है जैसे कुछ भी दिल तक उतरा नहीं।

 

शगुफ़्ता-ए-मौसम उदास है आज बहुत,

मगर उम्मीद की कली का वक़्त अभी गया नहीं।

 

मक़ता


मेघ, शिकवा भी किससे करे इस दिल का,

जब चाहत का ही रिश्ता अभी पूरा नहीं।

 

बुधवार, १७/१२/२५ , २०:०० hrs.

अजय सरदेसाई -मेघ


Tuesday, 16 September 2025

आहिस्ता आहिस्ता



 

ग़म बुंद-बुंद रिसता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

दिल तिल-तिल टूटता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

ख़्वाइशों की जगह टूटे ख़्वाबों ने ली आहिस्ता आहिस्ता।

लम्हा-लम्हा यूँ ही कटता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

रौनक़-ए-गुल मुरझाता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

पत्ता-पत्ता झड़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

रात-ए-बदर से चाँद सिकुड़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

शब-ए-तारीक़ सरकता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

दरिचों पे चिलमन पसरता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

धीरे-धीरे चेहरे पे नक़ाब चढ़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

सब्र-ए-दिल टूटता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

दर्द कतरा-कतरा बढ़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

उम्मीद का चराग़ ढलता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

अँधेरा हौले-हौले बढ़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

'मेघ' अश्क बहाता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

कतरा-कतरा सागर बनता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

मंगलवार, १६/९/२५ ,७:२८ PM

अजय सरदेसाई -मेघ


दिल-अज़ारी आपकी


 

मतला:

दिल के बदले दिल देते हो, साहुकारी आपकी।

आज के बाद हम भी करेंगे, तरफदारी आपकी।।

 

शेर २:

ऑंखों में सिमट लिया,वल्लाह, गिरफ़्तारी आपकी।

हिज़्र की रातों में देखी न जाए, बेकरारी आपकी।।

 

शेर ३:

आप से सिखे हमने जिंदगी के फलसफे।

आप ही से सिखी दिल-अज़ारी आपकी।।

 

शेर ४:

आपका नाम लिया तो रौशन शाम हो गई।

रात रात भर हम जागे,चाँदकारी आपकी।।

 

मक़ता:

मेघ कहता है इस ग़ज़ल में, है आपका ही असर।

शेरों में लफ़्ज़ मीरे है जरूर, शाइरी आपकी।।

 

सोमवार, १५/९/२५ , ९:०५ PM

अजय सरदेसाई -मेघ  

 

Sunday, 14 September 2025

तुम हसीं — मैं मुस्ताक़




तुम हसीं — मैं मुस्ताक़,

तुम अख़्लाक़ — मैं ग़ुस्ताख़।

इश्क़ है सादिक़, ये बस इत्तिफ़ाक़ —मैं ग़ुस्ताख़।


तेरी आँखों से बरसा नूर-ए-हया शबनम,

आँखों से पी लिया, हुआ तिश्नाक़ —मैं ग़ुस्ताख़।


तेरे सुख़न की सुर्ख़ी-ए-लब-ओ-नमी,

बस ख़्वाबों में चूमा, हुआ बे-अख़्लाक़ —मैं ग़ुस्ताख़।


तेरी ख़ामोशी सुनता रहा ख़्वाबों में,

तेरे चेहरे का नूर हुआ इशराक़ — मैं ग़ुस्ताख़।


“मेघ” चुप है, मगर दिल में तिरा तराना है,

दुनिया को क्या मालूम ये इश्तिराक़ —मैं ग़ुस्ताख़।


✍🏻

अजय सरदेसाई ‘मेघ’

रविवार · १४/९/२५ · ९:०३ PM

 

·        अख़्लाक़ = अच्छे संस्कारों वाला, शिष्ट और आदर्श व्यवहार करने वाला व्यक्ति

·        मुस्ताक़ = इच्छुक, आतुर

·        इत्तिफ़ाक़ = संयोग, घटना

·        तिश्नाक़ = प्यासा, आतुर

·        बे-अख़्लाक़ = बदतमीज़, बिन-शिष्टाचार

·        इशराक़ = सुबह का उजाला, रौशनी का फैलना

·        इश्तिराक़ = साझेदारी, साझापन

·        अख़्लाक़ = अच्छे संस्कारों वाला, शिष्ट और आदर्श व्यवहार करने वाला व्यक्ति

Saturday, 6 September 2025

सपनों का घर टूट गया


शेर १:

न जाने क्यों हमारा आईना यूँ टूटकर बिखर गया।

जो अक्स था परिवार का, वो हज़ार टुकड़ों में बंट गया।।

 

शेर २:

हर शख़्स अब ख़ुद की ही बातों में उलझा रहता है।

मोहब्बत का वो धागा, न जाने कब टूटकर कट गया।।

 

शेर ३:

एक वक़्त था दीवारें घर की उसकी चहक से गूंजतीं।

अब खामुशी का साया है, घर का घरपन टूट गया।।

 

शेर ४:

ख़्वाबों की जो रौनक थी, उसने भी साथ छोड़ा है।

परी-सी जो बिटिया थी घर की, उसका दिल भी टूट गया।।

 

शेर ५:

हर शख्स अब तलाशेगा उजाले, किसी नए आईने में।

सुना नही जो टूटा एक बार, फिर से वापस जुड़ गया।।

 

शेर ६:

मगर जो परी थी सलौनी,दो हिस्सों मे बट गयी।

घर उसके सपनों का जो बिचो-बिच से टूट गया।।


शनिवार , ६/९/२५ , १६:०० hrs
अजय सरदेसाई -मेघ


ग़ज़ल – इंतजार रौशनी का है


जिंदगी, क्या तेरे दिल में मुझे इज़्न-ए-क़याम है।

या फकत तेरे लबों पर मेरा बस नाम है।।

 

एक उम्र हुई, अंधेरों ने घेरा है मुझे।

इंतजार रौशनी का है, मुझे उसिसे काम है।।

 

हाथों में मिरी सिलवटें बन गई हैं।

शायद लकीरों का काम अब तमाम है।।

 

जब भी आईने में देखता हूँ अक्स।

सोचता हूँ, ये कौन शख़्स अल्लाम है।।

 

जिस्त मिरी इस तलाश में गुज़री।

न जाने कहाँ मेरा मुकाम है।।

 

मेघ’ तू अक्सर ढूंढता रहा ख़ुशी को।

तेरा ढूंढना अब भी नाकाम है।।

 

गुरुवार,४/९/२५, २:२८ PM

अजय सरदेसाई -मेघ