प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Thursday, 19 February 2026

दीवार-ओ-दर से मिलती है क्या शक्ल मेरी

दीवार-ओ-दर से मिलती है क्या शक्ल मेरी,
वो राह से गुज़रती है, देखती नहीं जान मेरी।

माना कि उसका रंग-ओ-रूप बड़ा क़ामिल,
ख़ुदा कसम, शक्ल अपनी भी नहीं बुरी।

दिल से यूँ लिपट गई हैं ख़ामोशियाँ तेरी,
तन्हाइयाँ ही लगती हैं अब हमसफ़र मेरी।

बिख़र गया हूँ फिर भी, टूटा नहीं हूँ मैं,
ख़ुद अपनी ही हिफ़ाज़त में है अब रूह मेरी।

‘मेघ’ रूह की हिफ़ाज़त में उम्र कट गई,
दुनिया रही न रही, बाक़ी रही ज़ात मेरी।

गूरुवार , १९/२/२६ , ०१:११ AM
अजय सरदेसाई -मेघ

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