दीवार-ओ-दर से मिलती है क्या शक्ल मेरी,
वो राह से गुज़रती है, देखती नहीं जान मेरी।
वो राह से गुज़रती है, देखती नहीं जान मेरी।
माना कि उसका रंग-ओ-रूप बड़ा क़ामिल,
ख़ुदा कसम, शक्ल अपनी भी नहीं बुरी।
दिल से यूँ लिपट गई हैं ख़ामोशियाँ तेरी,
तन्हाइयाँ ही लगती हैं अब हमसफ़र मेरी।
बिख़र गया हूँ फिर भी, टूटा नहीं हूँ मैं,
ख़ुद अपनी ही हिफ़ाज़त में है अब रूह मेरी।
‘मेघ’ रूह की हिफ़ाज़त में उम्र कट गई,
दुनिया रही न रही, बाक़ी रही ज़ात मेरी।
गूरुवार , १९/२/२६ , ०१:११ AM
अजय सरदेसाई -मेघ

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