प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Wednesday, 31 December 2025

वक्त का दरिया



वक्त के दरिया में बहता रहा वक्त मेरा।

चूल्लु मे बटोरना चाहा, फिसल गया वक्त मेरा।।

 

साहिल पर राह तकता रहा,न जाने कब आएगा वक्त मेरा।

खो गया वक्त के दरिया में,वो फिर न आया वक्त मेरा।।

 

जिंदगी युहीं चलती रही, वक्त का दरिया बहता रहा।

दरिया का कंकड़ बन गया,गुजरा हुआ वक्त मेरा।।

 

दिल की किताब में, स्याही के शब्दों में ढला ।

कुछ पुराने पन्नो में,सिमट गया है वक्त मेरा।।

 

जिंदगी के किताब में, कुछ सुखे हुए फूल मिले।

उनकी खुशबू की यादों में अब गुजरता है वक्त मेरा।।

 

आज फिर एक नया साल है और पिछला साल गुजर गया।

सत्तावन सालो की माला में 'मेघ' पिरोया हुआ है वक्त मेरा।।

 

गुरुवार, १/१/२६ १०:५४ AM

अजय सरदेसाई -मेघ


काळाचा प्रवाह


 

काळाच्या प्रवाहात वाहत राहिला माझा काळ,

ओंजळीत साठवू पाहिला, निसटून गेला माझा काळ।

 

काठावर उभा राहून मी वाटच पाहत राहिलो,

काळाच्या प्रवाहात हरवला; परत न आला माझा काळ।

 

आयुष्य पुढे सरकत राहिले काळाच्या अखंड प्रवाहात,

गुळगुळीत दगड बनला मागे पडलेला माझा काळ।

 

हृदयाच्या वहीत शाईत उतरलेले शब्द होते,

जुन्या पानांत अलगद विसावून राहिला माझा काळ।

 

आयुष्याच्या पुस्तकात काही वाळलेली फुले सापडली,

त्यांच्या वाळीक सुगंधात भरून राहिला माझा काळ।

 

आज पुन्हा एक नवे वर्ष आले,जुने नकळत निसटून गेले.

सत्तावन वर्षांच्या जीवनाची ‘मेघ’ ,मोतीमाळ झाला माझा काळ।

 

गुरुवार, १/१/२६ १०:५४ AM

अजय सरदेसाई -मेघ

Wednesday, 17 December 2025

अधूरा रिश्ता

 



 

मतला


तेरी ज़िंदगी में होना कुछ एहसान नहीं,

जैसे उम्र-दराज़ दरख़्त पे हर पत्ता हरा नहीं।

 

अक्सर ये सोचता हूँ, ये कैसा रिश्ता बना,

जो महसूस तो होता है, मगर पूरा अपना नहीं।

 

मौजूद है हर लम्हा, एहसास मगर कम ही रहा,

लगता है जैसे कुछ भी दिल तक उतरा नहीं।

 

शगुफ़्ता-ए-मौसम उदास है आज बहुत,

मगर उम्मीद कि कली का वक़्त अभी गया नहीं।

 

मक़ता


मेघ, शिकवा भी किससे करे इस दिल का,

जब चाहत का ही रिश्ता अभी पूरा नहीं।

 

बुधवार, १७/१२/२५ , २०:०० hrs.

अजय सरदेसाई -मेघ


Saturday, 8 November 2025

दिल के जज़्बात


 

मुहब्बत हो गई है तो उसे जताना चाहिए।
दिल के जज़्बातों को यूँ न छुपाना चाहिए।।

आसमॉं में बादल मंडरा रहे है बड़ी देर से।
अब तो बारिश बनकर उन्हे बरसना चाहिए।।

दर्द को कब तलक दिल में यूँ छिपाओगे तुम।
कभी तो आँसुओं के जरिए से उसे जताना चाहिए।।

दूरियां दिल की न हो,फासले जिस्मों के लंबे सही।
इन फासलों के दरमियान भी दिलों को मिलना चाहिए।।

अगर बाज हो तूम और अंदाज वहीं रखते हो।
'मेघ' फिर सुरज को भी छुकर लौटने का इरादा होना चाहिए।।


रविवार, ९/११/२०२५ , १०:१५ AM
अजय सरदेसाई -मेघ

Saturday, 20 September 2025

who is my guru, my friend?


Unseen, how blooms the butterfly on desert vine,
Who tends the tall green sprout where sands align?


At dawn alone, why does the flower awake,
Who fills the buds with whispers that no eye can take?


Why do egrets’ garlands soar in skies so wide,
Blooming in shapes where only winds can glide?


Though notes and letters in endless forms may play,
The primal sound remains—Oṃ, eternal, they say.


The cosmic hum, the Brahm, how did it take its flight,
Across the vastness, turning darkness into light?


Who will tell me these secrets, to whom shall I bend?
That silent witness of all—who is my guru, my friend?


Saturday, 20/9/25 ,09:20 PM
Ajay Sardesai -Megh

कोण - कसे



नकळत कैसै होते सुरवंटाचे फुलपाखरू,
कोण पोशितो वाळवंटी उंच हिरवे तरू.


सूर्योदयीच का कुसुम फुलते,
कोण कळ्यांत भरते वारु,
का बगळ्यांची माळ फुले आकाशांत त्याच आकारू.


स्वर नी व्यंजन किती ही असले तरी मुळ नाद तो ओंकारु,
नाद ब्रम्ह हा ब्रम्हांडात या झाला कसा साकारु.


कोण सांगेल उत्तर यांचे, कोणास मी विचारू.
तो सर्व साक्षी कोण आहे, कोण माझा सदगुरू.


शनिवार, २०/९/२५ , ०८:३५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Thursday, 18 September 2025

आईने में जो अक्स देखोगे तो घबराओगे



आईने में जो अक्स देखोगे तो घबरा जाओगे।
घर, शहर, ये दुनिया — सब छोड़ जाओगे।।


सन्नाटे में जब नाम अपना पुकारोगे।
जवाब न आया तो भीतर सहम जाओगे।।


मिट्टी की महक से जब सचाई उभरेगी।
टूटे रिश्तों के बिखरे सियों में उलझ जाओगे।।


नींदों में जो ख़्वाब टूटा सा पाओगे।
सुबह को उजाला देखकर तड़प जाओगे।।


दिल में जो बचा-खुचा सपना जगाओगे।
ख़ुद को ही अजनबी बनता पाओगे।।


"मेघ" आख़िर में जब चुपचाप बैठ जाओगे।
बस अपनी साँसों का बोझ महसूस कर जाओगे।।


गुरुवार, १८/९/२५ , ११:०२ AM
अजय सरदेसाई -मेघ

खंत

तारुण्यातली स्वप्ने विरून गेली, ही खंत।
आयुष्याची कळी गर्दीत चिरडून गेली, ही खंत।।


जपलं जे गुपित हृदयात, अंतरीच राहीलं।
मनातून ओठांवर न आलं, ही खंत।।


वाटलं होतं उमलतील पुन्हा नवी फुलं।
न उमलतांच पाकळ्या गेल्या झडून -ही खंत।।


प्रीत माझ्या मनातली, जरी गहिरी।
तुला न कळली सखे, ही खंत।।


"मेघ" अश्रूंमध्ये भिजत भिजत रात्र सरली।
माझा उदयस्त सूर्य मलूल-ही खंत।।


गुरुवार, १८/९/२५ , ०३:०१ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Tuesday, 16 September 2025

आहिस्ता आहिस्ता



 

ग़म बुंद-बुंद रिसता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

दिल तिल-तिल टूटता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

ख़्वाइशों की जगह टूटे ख़्वाबों ने ली आहिस्ता आहिस्ता।

लम्हा-लम्हा यूँ ही कटता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

रौनक़-ए-गुल मुरझाता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

पत्ता-पत्ता झड़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

रात-ए-बदर से चाँद सिकुड़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

शब-ए-तारीक़ सरकता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

दरिचों पे चिलमन पसरता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

धीरे-धीरे चेहरे पे नक़ाब चढ़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

सब्र-ए-दिल टूटता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

दर्द कतरा-कतरा बढ़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

उम्मीद का चराग़ ढलता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

अँधेरा हौले-हौले बढ़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

'मेघ' अश्क बहाता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

कतरा-कतरा सागर बनता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

मंगलवार, १६/९/२५ ,७:२८ PM

अजय सरदेसाई -मेघ


दिल-अज़ारी आपकी


 

मतला:

दिल के बदले दिल देते हो, साहुकारी आपकी।

आज के बाद हम भी करेंगे, तरफदारी आपकी।।

 

शेर २:

ऑंखों में सिमट लिया,वल्लाह, गिरफ़्तारी आपकी।

हिज़्र की रातों में देखी न जाए, बेकरारी आपकी।।

 

शेर ३:

आप से सिखे हमने जिंदगी के फलसफे।

आप ही से सिखी दिल-अज़ारी आपकी।।

 

शेर ४:

आपका नाम लिया तो रौशन शाम हो गई।

रात रात भर हम जागे,चाँदकारी आपकी।।

 

मक़ता:

मेघ कहता है इस ग़ज़ल में, है आपका ही असर।

शेरों में लफ़्ज़ मीरे है जरूर, शाइरी आपकी।।

 

सोमवार, १५/९/२५ , ९:०५ PM

अजय सरदेसाई -मेघ  

 

Sunday, 14 September 2025

वो हसीं मैं मुस्ताक़


मतला:
वो हसीं मैं मुस्ताक़,वो अख़्लाक़ मैं ग़ुस्ताख़। 
मेरा इश्क़ है सादिक़,ये बस इत्तिफ़ाक़,मैं ग़ुस्ताख़।।
 
शेर २:
तेरी आँखों से बरसी,वो नूर-ए-हया की शबनम।
मैंने नज़रों से पिली, तो मैं तिश्नाक, मैं ग़ुस्ताख़।।
 
शेर ३:
तेरी बातों में थी, वो सुर्ख़ी-ए-लब-ओ-नमी।
मैंने ख़्वाबों में चूमा, हुआ बे-अख़्लाक़ मैं ग़ुस्ताख़।।
 
शेर ४:
तिरी ख़ामुशी बोली, मैं सुनता रहा ख़्वाबों में।
रात भर तिरे चेहरे का नूर हुआ इशराक़, मैं ग़ुस्ताख़।।
 
मक़ता:
"मेघ" चुप है मगर दिल में तिरा तराना है।
दुनिया को नहीं मालूम ये इश्तिराक़, मैं ग़ुस्ताख़।।
 
 
रविवार, १४/९/२५ , ९:०३ PM
अजय सरदेसाई -मेघ 

 

·        अख़्लाक़ = अच्छे संस्कारों वाला, शिष्ट और आदर्श व्यवहार करने वाला व्यक्ति

·        मुस्ताक़ = इच्छुक, आतुर

·        इत्तिफ़ाक़ = संयोग, घटना

·        तिश्नाक़ = प्यासा, आतुर

·        बे-अख़्लाक़ = बदतमीज़, बिन-शिष्टाचार

·        इशराक़ = सुबह का उजाला, रौशनी का फैलना

·        इश्तिराक़ = साझेदारी, साझापन

·        अख़्लाक़ = अच्छे संस्कारों वाला, शिष्ट और आदर्श व्यवहार करने वाला व्यक्ति

अंदाज मी ठेवत नाही

मतला:
ते म्हणतात, शब्दांचा लिहाज मी ठेवत नाही।
ही अदा काय कमी आहे, की कटूतेचा अंदाज मी ठेवत नाही।।

शेर २:
असतील कुणी सुसंस्कृत, ज्यांची शिष्टाई अदबी आहे।
मी भावनांचा प्रेमी आहे, अदबी अंदाज मी ठेवत नाही।।

शेर ३:
माझी रचना ग़ज़ल नसेल कदाचित, नज़्मच आहे।
भावना भिडल्या तर क़ाफ़िया-रदीफ़चा अंदाज मी ठेवत नाही।।

शेर ४:
साहित्यिक तो, जो शब्दांत भावना मिसळतो।
ग़ालिब सारखा भाषेचा अंदाज मी ठेवत नाही।।

मक़ता:
मी ‘मेघ’ आहे, हे आकाश माझेच आहे।
वाहत्या वाऱ्यांचा अंदाज मी ठेवत नाही।।

शनिवार, १३/९/२५ ,५;५५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

अंदाज़ मैं रखता नहीं


मतला:
कहते हैं वो कि मैं हर्फ़ों का लिहाज़ मैं रखता नहीं।
ये अदा क्या कम है, कि तल्ख़ियों का अंदाज़ मैं रखता नहीं।।

शेर २:
वो होंगे और जो आदाब-ए-अदबी हैं।
मैं जज़्बातों का क़ाइल हूँ, वो अंदाज़ मैं रखता नहीं।।

शेर ३:
ग़ज़ल न सही, नज़्म ही सही,कोई गिला मैं रखता नहीं।।
जज़्बात छू जाएँ तो काफ़िया-ओ-रदीफ़ के साज़ मैं रखता नहीं।।

शेर ४:
सुख़नवर वो जो हर्फ़ों में घोल दे जज़्बात सारे।।
ग़ालिब-सी हर्फ़-ओ-ज़ुबाँ का मिजाज़ मैं रखता नहीं।।

मक़ता:
मैं ‘मेघ’ हूँ, आसमाँ पर सल्तनत मेरी रही।।
रुख़ हवाओं का है किस जानिब, अंदाज़ मैं रखता नहीं।।

शनिवार, १३/९/२५ , ५:५५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ