वक्त के दरिया में बहता
रहा वक्त मेरा।
चूल्लु मे बटोरना चाहा, फिसल गया वक्त मेरा।।
साहिल पर राह तकता रहा,न जाने कब आएगा वक्त
मेरा।
खो गया वक्त के दरिया में,वो फिर न आया वक्त मेरा।।
जिंदगी युहीं चलती रही, वक्त का दरिया बहता रहा।
दरिया का कंकड़ बन गया,गुजरा हुआ वक्त मेरा।।
दिल की किताब में, स्याही के शब्दों में ढला
।
कुछ पुराने पन्नो में,सिमट गया है वक्त मेरा।।
जिंदगी के किताब में, कुछ सुखे हुए फूल मिले।
उनकी खुशबू की यादों में अब गुजरता है वक्त मेरा।।
आज फिर एक नया साल है और पिछला साल गुजर गया।
सत्तावन सालो की माला में 'मेघ' पिरोया हुआ है वक्त मेरा।।
गुरुवार, १/१/२६ १०:५४ AM
अजय सरदेसाई -मेघ
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