प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Wednesday, 31 December 2025

वक्त का दरिया



वक्त के दरिया में बहता रहा वक्त मेरा।

चूल्लु मे बटोरना चाहा, फिसल गया वक्त मेरा।।

 

साहिल पर राह तकता रहा,न जाने कब आएगा वक्त मेरा।

खो गया वक्त के दरिया में,वो फिर न आया वक्त मेरा।।

 

जिंदगी युहीं चलती रही, वक्त का दरिया बहता रहा।

दरिया का कंकड़ बन गया,गुजरा हुआ वक्त मेरा।।

 

दिल की किताब में, स्याही के शब्दों में ढला ।

कुछ पुराने पन्नो में,सिमट गया है वक्त मेरा।।

 

जिंदगी के किताब में, कुछ सुखे हुए फूल मिले।

उनकी खुशबू की यादों में अब गुजरता है वक्त मेरा।।

 

आज फिर एक नया साल है और पिछला साल गुजर गया।

सत्तावन सालो की माला में 'मेघ' पिरोया हुआ है वक्त मेरा।।

 

गुरुवार, १/१/२६ १०:५४ AM

अजय सरदेसाई -मेघ


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