प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....
Showing posts with label hindi. Show all posts
Showing posts with label hindi. Show all posts

Monday, 2 March 2026

मय




मय चीज़ ऐसी है जो 'मैं 'को भुला देती है,
हर इंसान को अपने रंग में रंगा देती है।

दिल के सारे शिकवे, ग़म धुएँ में उड़ा देती है,
ख़ुष्क रूह में भी जैसे नमी-सी जगा देती है।

होश वालों की दुनिया को ज़रा दूर हटा देती है,
दो घड़ी के लिए बंदे को खुदा-सा बना देती है।

कौन अपना है, कौन पराया — सब भुला देती है,
एक प्याले में सारी फ़ासले मिटा देती है।

साक़ी की एक नज़र दिल में उजाला देती है,
बुझती हुई हर लौ को फिर से जला देती है।

जब-जब ये लबों से लगी, पर्दे गिरा देती है,
अंदर की हर फ़ितरत को खुल के हवा देती है।

मैं ढूँढता फिरता हूँ जिसे सारी उम्र भर,
मय हँस के उसी राह का पता बता देती है।

खुशकिस्मत हैं जिन्हें मय से परहेज़ नहीं,
ये वो शय है जो 'ख़ालिक़ 'से मिला देती है।

— अजय सरदेसाई ‘मेघ’
रविवार, १/३/२६ , १०:४५ AM

Wednesday, 11 February 2026

कुची

 



कुची से दर्द के रंग भरता रहा मैं,
हर लफ़्ज़ में सोज़-ए-दिल उभरता रहा मैं।
सफ़्हे थे ख़ामोश, मगर बोलती थीं रेखाएँ,
भीतर के हर ज़ख़्म को पढता रहा मैं।
कोई न समझा ये तसवीर क्यों नम-सी है,
आँखों से चुपचाप रंग झरता रहा मैं।
दाद क्या मिलती, तसल्ली भी कहाँ थी,
बस अपने ही साए से गुज़रता रहा मैं।
जब-जब भी यादों की हवा तेज़ चली है,
टूटे हुए ख़्वाबों को बिखरता रहा मैं।
आख़िर में ये जाना, ऐ ‘मेघ’, हुनर क्या है—
दिल जलता रहा और निखरता रहा मैं।



बुधवार, ११/२/२६ , १०:३३ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

गुज़रे हुए लम्हे


 गुज़रे हुए लम्हे क्या लौटकर आते हैं,
समझाने से भला किसे समझ आते हैं।


जो पल थे सुहाने, यादों में ही खिलते हैं,
हम उन्हीं के सहारे सफ़र-ए-ज़िंदगी चलते हैं।


जो फूल खिले हैं, कब तक मुस्कुराएँगे,
ख़ुशबू लुटाकर एक दिन मुरझाएँगे।


ख़्वाबों की उम्र भी कितनी ठहर पाती है,
आँख खुलते ही हर तस्वीर बिखर जाती है।


कितना भी थामो इन्हें, ये फिसल जाते हैं,
यही तो जीवन है — सब एक दिन ढल जाते हैं।


बुधवार, ११/२/२६ , ८:३० PM
अजय सरदेसाई -मेघ 

Friday, 16 January 2026

मक्तूब - नज़्म


 


 

आजकल मिलता नहीं ख़ुदा कहीं,
सोचता हूँ—उसे चिट्ठी लिख दूँ।
मक्तूब में उस, उसी के लिए,
अपने सारे गिले-शिकवे लिख दूँ।
आवारा, पागल, दीवाना कह लो,
एक नाम तो ख़ुद को लिख दूँ।
दिल तो पहले से तेरे नाम दर्ज है,
तू कहे तो ये ज़िंदगी लिख दूँ।
क़ुर्ब की आरज़ू है सबको यहाँ,
मैं भी अपनी आरज़ू लिख दूँ।
गर वो चाहे हर एक सज्दे में,
जबिं पर अपनी फ़ित्र ही लिख दूँ।
मेघ बशर हूँ, सवाल मेरा हक़ है,
ख़ुद को ख़ुदा के नाम लिख दूँ।
 

गुरुवार, १६/१/२६ , ११:४५ AM

अजय सरदेसाई -मेघ

कुछ फ़क़ीरी थी अपनी


कुछ फ़क़ीरी थी अपनी, कुछ ख़िज़ाँ का रंग था।

राह में हम ही थे बस, और कोई न संग था।।

 

पतझड़ में दरख़्तों से तो पत्ते झड़ते ही हैं।

बस नाम हवा का आया, मौसम ज़रा तंग था।।

 

भीड़ में रह के भी हम सब से दूर रहे।

शहर बहुत रंगीन था, लेकिन कहीं न मेरा रंग था।।

 

जो कहा न जा सका, आँखों ने कह दिया आख़िर।

लब ख़ामोश थे अपने,मन निहंग था।।

 

मेघ, शिकवा भी क्या करें इस ज़माने से हम।

जो लिखा था मुक़द्दर में, वही जब बेढंग था।।

 

गुरुवार , १५/१/२६ , ०९:०० PM

अजय सरदेसाई - मेघ


Wednesday, 14 January 2026

दूर तुम चलते जाओ तो



 

दूर तुम चलते जाओ तो,

आगे खुले समंदर होंगे।

हवाओं से गुफ़्तगू होगी,

आसमाँ में बादल चलेंगे।

 

लहरों पर उछलती नावें होंगी,

उन पर मंडराते पंछी होंगे।

कमसिन साँसें मन को छू जाएँगी,

नए-नवेले मंजर भी होंगे।

 

रास्ते थक कर जब रुकेंगे,

पाँवों में नम-सी रेत बचेगी।

सूरज ढलते-ढलते चुपके से,

शाम किसी गीत-सी सजेगी।

 

जहाँ सवालों की भीड़ न होगी,

और जवाबों की जल्दी भी न होगी।

कुछ बातें बस महसूस होंगी,

कहने की मजबूरी भी न होगी।

 

वक़्त वहाँ धीमे चलता होगा,

साँसें खुद को सुन पाएँगी।

जो खोया था शोर में कभी,

वो आवाज़ें लौट आएँगी।

 

क्षितिज के परे एक बुलावा होगा,

किसी नए देश का मेला होगा।

जब नाव में आगे बढ़ जाओगे,

हौसला आगे, डर पीछे होगा।

 

बुधवार, १४/१/२६ , ०१:३० PM

अजय सरदेसाई -मेघ

Tuesday, 13 January 2026

मुझे बनना है एक हास्य कवि


मुझे बनना है एक हास्य कवि,

जो हँसती-हँसाती बात कहे।

हास्य रस का स्वाँग ओढ़े,

पर कविता सच की आग कहे।

हँसी रहे श्रोता के होठों पर,

पर भीतर कुछ टूटता जाए।

आँखों में ठहरे मौन के आँसू,

और आदमी खुद से टकरा जाए।

हँसते-हँसते जब सोच जगे,

जब तालियों में सन्नाटा हो,

तब समझूँगा मेरी कविता ने

दिल के दरवाज़े खटखटाए हो।

शैल-सा व्यंग्य,

चक्रधर-सी चोट,

नीरज-सी करुण पुकार—

क्या मैं भी कभी सीख पाऊँगा

हँसी में लपेटकर ऐसा प्रहार?

जो जीना सिखा दे हँसते-हँसते,

जो रोते-रोते सच कह जाए,

जो आईना रख दे चेहरे के आगे,

और आदमी नज़रें न चुरा पाए।

मधुशाला-सी मेरी कवि-शाला होगी,

कान होंगे नाज़ुक पैमाने,

शब्दों की मदिरा ऐसी होगी

जो चढ़ जाए — पर होश बचाए।

मैं हँसाऊँगा…

फिर ठहरूँगा…

फिर एक सवाल छोड़ जाऊँगा।

जो हँसाकर सच समझा दे,

बस ऐसा कवि कहलाऊँगा।

और एक दिन—

अपने गुरुओं की आँखों में

क्या मैं कभी उभर पाऊँगा?

 

मंगलवार, १३/१/२६ , ०९:१० PM

अजय सरदेसाई -मेघ


वही दिल दिखाओ



1️ मतला / पहला शेर

 

दिल की शमा जला कर दर्द को राह दिखाओ,

आँखों में आँसू कम हैं, मुझे समंदर दिखाओ।।

 

2️ दूसरा शेर

 

वक़्त मरहम है दुनिया में हर ज़ख्म का,

जो वक्त न भर सका वो ज़ख्म दिखाओ।।

 

3️ तीसरा शेर

 

इस दुनिया में आए और गए बहुत सिकंदर,

जो वक्त से जित पाया हो वो सिकंदर दिखाओ।।

 

4️ चौथा शेर

 

आफताब, माहताब सब देख लिया, सब पुराने हो गये,

ग़ज़ल में ढालने को अब कुछ नया तश्वीर दिखाओ।।

 

5️ मकता

 

मेघ, जो आँखों से परे हो, न वो जहां दिखाओ।

दिल की सदा पहुँचती है जिस दिल तक, बस वही दिल दिखाओ।।

 

मंगलवार, १३/१/२६ , ०६:१५ PM

अजय सरदेसाई -मेघ


अब मैं शब्दों को दौड़ाता नहीं


अब मैं शब्दों को दौड़ाता नहीं,

उन्हें यूंही बैठने देता हूँ मेरे पास।

 

जो कहना था, वह सब कह चुका है मन,

अब न कहना भी एक संवाद सा लगता है।

 

थक गए हैं जज़्बात भी चीख़ते-चीख़ते,

आज ख़ामोशी को ओढ़ लेना सुहाना लगता है।

 

न उजाले की ज़िद, न अँधेरे से बैर,

जो मिला है वही अब काफ़ी लगता है।

 

मैं ठहर गया हूँ वक़्त के कंधे पर,

अब न आगे की जल्दी, न पीछे का अफ़सोस लगता है।

 

सोमवार, १२/१/२६ , ०८:०० PM

अजय सरदेसाई -मेघ


जिक्र-ए-सुख़न


जिक्र-ए-सुख़न जब भी होगा, ग़ालिब के नाम की रौशनी होगी।

चिराग़ मेरा भी जलेगा, शमा मेरे नाम की भी होगी।।

 

ऐ आसमानी फ़रिश्तों, नीचे फ़र्श पर देखो ज़रा,

आज जहाँ तुम हो, कल वहाँ मेरी शौहरत होगी।।

 

वक़्त बदलता है अगर हौसले हों बुलंद, दिल में उमंग हो,

जज़्बातों का जलज़ला आएगा, और हर्फ़ों की बरसात होगी।।

 

 

 

सोमवार, १२/१/२६, ०७:२० PM

अजय सरदेसाई -मेघ


यादों के दरीचे


तिरे जानिब से न कोई निशां मिला

यादों की दरिचों में बस टूटा सामान मिला।।

 

टूटीफूटी ख्वाहिशों के अंबार पर

किसी गैर के ख्वाब का आशियां मिला।।

 

जबीं को झुकाया तेरी राह में मैंने

तड़प फिर भी रही, न मुझे ठिकाना मिला।।

 

दिल का परिंदा छटपटा रहा बेहाल।

उम्र भर उसे कोई कारवां न मिला।।

 

राब्ता उमिदों का दिल की गलियों में अब नहीं।

उस रास्ते का मुसाफ़िर जो भी मिला, अंजान मिला।।

 

सोमवार, १२/१/२६ ०४:३३ PM

अजय सरदेसाई -मेघ