प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Wednesday, 14 January 2026

दूर तुम चलते जाओ तो



 

दूर तुम चलते जाओ तो,

आगे खुले समंदर होंगे।

हवाओं से गुफ़्तगू होगी,

आसमाँ में बादल चलेंगे।

 

लहरों पर उछलती नावें होंगी,

उन पर मंडराते पंछी होंगे।

कमसिन साँसें मन को छू जाएँगी,

नए-नवेले मंजर भी होंगे।

 

रास्ते थक कर जब रुकेंगे,

पाँवों में नम-सी रेत बचेगी।

सूरज ढलते-ढलते चुपके से,

शाम किसी गीत-सी सजेगी।

 

जहाँ सवालों की भीड़ न होगी,

और जवाबों की जल्दी भी न होगी।

कुछ बातें बस महसूस होंगी,

कहने की मजबूरी भी न होगी।

 

वक़्त वहाँ धीमे चलता होगा,

साँसें खुद को सुन पाएँगी।

जो खोया था शोर में कभी,

वो आवाज़ें लौट आएँगी।

 

क्षितिज के परे एक बुलावा होगा,

किसी नए देश का मेला होगा।

जब नाव में आगे बढ़ जाओगे,

हौसला आगे, डर पीछे होगा।

 

बुधवार, १४/१/२६ , ०१:३० PM

अजय सरदेसाई -मेघ

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