दूर तुम चलते जाओ तो,
आगे खुले समंदर होंगे।
हवाओं से गुफ़्तगू होगी,
आसमाँ में बादल चलेंगे।
लहरों पर उछलती नावें होंगी,
उन पर मंडराते पंछी होंगे।
कमसिन साँसें मन को छू जाएँगी,
नए-नवेले मंजर भी होंगे।
रास्ते थक कर जब रुकेंगे,
पाँवों में नम-सी रेत बचेगी।
सूरज ढलते-ढलते चुपके से,
शाम किसी गीत-सी सजेगी।
जहाँ सवालों की भीड़ न होगी,
और जवाबों की जल्दी भी न होगी।
कुछ बातें बस महसूस होंगी,
कहने की मजबूरी भी न होगी।
वक़्त वहाँ धीमे चलता होगा,
साँसें खुद को सुन पाएँगी।
जो खोया था शोर में कभी,
वो आवाज़ें लौट आएँगी।
क्षितिज के परे एक बुलावा होगा,
किसी नए देश का मेला होगा।
जब नाव में आगे बढ़ जाओगे,
हौसला आगे, डर पीछे होगा।
बुधवार, १४/१/२६ , ०१:३० PM
अजय सरदेसाई -मेघ
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