आजकल मिलता नहीं ख़ुदा कहीं,सोचता हूँ—उसे चिट्ठी लिख दूँ।मक्तूब में उस, उसी के लिए,अपने सारे गिले-शिकवे लिख दूँ।आवारा, पागल, दीवाना कह लो,एक नाम तो ख़ुद को लिख दूँ।दिल तो पहले से तेरे नाम दर्ज है,तू कहे तो ये ज़िंदगी लिख दूँ।क़ुर्ब की आरज़ू है सबको यहाँ,मैं भी अपनी आरज़ू लिख दूँ।गर वो चाहे हर एक सज्दे में,जबिं पर अपनी फ़ित्र ही लिख दूँ।मेघ बशर हूँ, सवाल मेरा हक़ है,ख़ुद को ख़ुदा के नाम लिख दूँ।
गुरुवार, १६/१/२६ , ११:४५ AM
अजय सरदेसाई -मेघ
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