हम तक्कलूफ़ को भी
इख़्लास समझते रहे।
रात हिज़्र की थी, हम वस्ल की समझते रहे।।
अँधेरे में ख़ुशी की ग़लत ताबी़र कर ली।
डूबते सूरज को आफ़्ताब-ए-सहर समझते रहे।।
सावन की बरसात आग बरसा रही थी जालिम।
हम यूँ ही उसे दिल की अगन समझते रहे।।
लफ़्ज़ों की मिठास पर यक़ीन इतना रहा।
ख़ामोश ज़हर को भी शहद समझते रहे।।
जो ज़ख़्म मिला दिल को, वही मरहम समझते रहे।
हम दर्द देने वाले को हमदर्द समझते रहे।।
आईने ने सच कहा, मगर हमने न माना।
अपने ही साये को रक़ीब समझते रहे।।
अब होश आया तो जाना ग़लती कहाँ हुई।
ज़िंदगी एक इम्तिहान थी 'मेघ', तुम इनाम समझते रहे।।
सोमवार,१२/१/२६ , ११:३० AM
अजय सरदेसाई -मेघ
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