प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Wednesday, 14 January 2026

श्रोता की तलाश







कोई तो श्रोता मिल जाए मुझे,
मेरी कविताएँ सुनने वाला।
मिल जाए मुझे जो किसी दिन,
सुनाऊँ उसे मैं कविताएँ आला।


कविताओं में होंगी बहुत-सी
यहाँ-वहाँ की बातें,
इधर-उधर की दूर दिशाओं की
होंगी अनगिनत सौगातें।


कविता में होगी नर्म सुबह भी,
और सृजनात्मक सूरज होगा,
सैर करेंगे साथ उनके हम,
जब तक न अँधेरा होगा।


नवरंगों से नवरसों से भरी
होंगी मेरी रचनाएँ,
कैसी लगीं उसे मेरी कविताएँ,
यह श्रोता मुझको बतलाए।


चाँदनी रात आएगी तब तक,
फिर मैं ग़ज़ल सुनाऊँगा,
चिराग़ जलेंगे धीरे-धीरे,
एक नज़्म में गुनगुनाऊँगा।


चाह यही है कि यह महफ़िल
रात भर चलती रहे,
रात का अंत न कभी भी हो,
और मेरी कविता चलती रहे।

कविता मेरी चलती रहे।
बस — मेरी ही कविता चलती रहे।


बुधवार, १४/१/२६ , ०८:३२ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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