कुछ फ़क़ीरी थी अपनी, कुछ ख़िज़ाँ का रंग था।
राह में हम ही थे बस, और कोई न संग था।।
पतझड़ में दरख़्तों से तो पत्ते झड़ते ही हैं।
बस नाम हवा का आया, मौसम ज़रा तंग था।।
भीड़ में रह के भी हम सब से दूर रहे।
शहर बहुत रंगीन था, लेकिन कहीं न मेरा रंग
था।।
जो कहा न जा सका, आँखों ने कह दिया आख़िर।
लब ख़ामोश थे अपने,मन निहंग था।।
मेघ, शिकवा भी क्या करें इस
ज़माने से हम।
जो लिखा था मुक़द्दर में,
वही जब बेढंग
था।।
गुरुवार , १५/१/२६ , ०९:०० PM
अजय सरदेसाई - मेघ
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