प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
....

Tuesday, 13 January 2026

सफर



 

मतला

 

न दोस्त मिले न ही मंज़िल का इंतिख़ाब रहा।

कदम बढ़ते रहे बे सबब, दर्द का क़ाफ़िला बेहिसाब रहा।।

 

शब की मासूमियत पर ख़्वाहिशें फ़िदा हुईं,

हर एक ख़्वाहिश में ज़िन्दगी का ख़ुमार रहा।।

 

आईना भी अब सवाल करने लगा मुझसे,

हर एक अक्स में कोई ज़ख़्म नायाब रहा।।

 

हमने ख़ामोशी को भी तजुर्बा समझ कर ओढ़ लिया,

हर जवाब के तले इक अधूरा हिसाब रहा।।

 

जो मिला भी, वो बिछड़ने की दुआ बन गया,

इस मुक़द्दर में मिलन बस एक ख़्वाब रहा।।

 

चलते-चलते थक गया दिल भी यक़ीं से।

उम्र भर का हर सफ़र भी बे निसाब रहा।।

 

मक्ता

 

'मेघ', दर्द ने ही सिखाया शायरी का सलीक़ा।

वरना लफ़्ज़ों में कहाँ इतना असर, इतना आब रहा।।

 

सोमवार,१२/१/२६ , २:१५ PM

अजय सरदेसाई -मेघ


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