मुझे बनना है एक हास्य
कवि,
जो हँसती-हँसाती बात कहे।
हास्य रस का स्वाँग ओढ़े,
पर कविता सच की आग कहे।
हँसी रहे श्रोता के होठों पर,
पर भीतर कुछ टूटता जाए।
आँखों में ठहरे मौन के आँसू,
और आदमी खुद से टकरा जाए।
हँसते-हँसते जब सोच जगे,
जब तालियों में सन्नाटा हो,
तब समझूँगा मेरी कविता ने
दिल के दरवाज़े खटखटाए हो।
शैल-सा व्यंग्य,
चक्रधर-सी चोट,
नीरज-सी करुण पुकार—
क्या मैं भी कभी सीख पाऊँगा
हँसी में लपेटकर ऐसा प्रहार?
जो जीना सिखा दे हँसते-हँसते,
जो रोते-रोते सच कह जाए,
जो आईना रख दे चेहरे के आगे,
और आदमी नज़रें न चुरा पाए।
मधुशाला-सी मेरी कवि-शाला होगी,
कान होंगे नाज़ुक पैमाने,
शब्दों की मदिरा ऐसी होगी
जो चढ़ जाए — पर होश बचाए।
मैं हँसाऊँगा…
फिर ठहरूँगा…
फिर एक सवाल छोड़ जाऊँगा।
जो हँसाकर सच समझा दे,
बस ऐसा कवि कहलाऊँगा।
और एक दिन—
अपने गुरुओं की आँखों में
क्या मैं कभी उभर पाऊँगा?
मंगलवार, १३/१/२६ , ०९:१० PM
अजय सरदेसाई -मेघ
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