अब मैं शब्दों को दौड़ाता
नहीं,
उन्हें तुम्हीं बैठने देता हूँ मेरे पास।
जो कहना था, वह सब कह चुका है मन,
अब न कहना भी एक संवाद सा लगता है।
थक गए हैं जज़्बात भी चीख़ते-चीख़ते,
आज ख़ामोशी को ओढ़ लेना सुहाना लगता है।
न उजाले की ज़िद, न अँधेरे से बैर,
जो मिला है वही अब काफ़ी लगता है।
मैं ठहर गया हूँ वक़्त के कंधे पर,
अब न आगे की जल्दी, न पीछे का अफ़सोस लगता है।
सोमवार, १२/१/२६ , ०८:०० PM
अजय सरदेसाई -मेघ
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