प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Wednesday, 23 September 2026

लिखकर दूॅं


तू कहे तो तेरे नाम मेरी ज़िंदगी लिखकर दूँ,
तू मेरी ज़िंदगी है, तुम्हीं को तुम्हें लिखकर दूँ।

सभी कुछ तेरा है, और मैं भी तो तुम्हारा हूँ,
अब इसके सिवा और क्या तुम्हें लिखकर दूँ।

ये ज़मीन ये आसमान ये वादियाँ हसीं तुम्हीं से हैं,
कहो तो एक बार क्या ये सभी तुम्हें लिखकर दूँ।

तस्कीन गर मुहब्बत में है तो वो तुम्हीं से है,
मुस्कुरा दो एक बार तो ये तस्कीन तुम्हें लिखकर दूँ।

तुम रब हो मेरे, तुम्हीं से वजूद है मेरा,
प्यार से देखो मुझे, तुम्हें ख़ुदा लिखकर दूँ।

'मेघ' कहते हैं मुझे, मुझसे बारिशों की रवानी है,
तुम रअद बन जाओ तो तुम्हें बरसात लिखकर दूँ

बुधवार, २३/९/२६ , ०१:०८ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

रअद = बादल की गरज

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