प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Saturday, 7 February 2026

दूर रहकर भी वो जुदा न हुआ…


बरसों बाद उस दिन न जाने क्यों मेरे कदम अपने-आप कॉलेज की तरफ़ मुड़ गए।
गेट वही था, दीवारें वही, बस रंग कुछ फीके पड़ गए थे। गलियारे में चलते हुए जूतों की आवाज़ कुछ ज़्यादा ही साफ़ सुनाई दे रही थी, जैसे सन्नाटा हर आहट को बढ़ा देता हो।
मैं अपनी पुरानी क्लास के दरवाज़े पर आकर रुक गया।
कुछ पल यूँ ही खड़ा रहा। हाथ बढ़ाकर दरवाज़ा खोला तो वह हल्की-सी चरमराहट के साथ खुला—और अंदर एक खाली कमरा मेरा इंतज़ार करता मिला।
बेंचें करीने से पड़ी थीं, ब्लैकबोर्ड पर चॉक की धूल जमी थी, और खिड़की से आती धूप फर्श पर चुपचाप फैल रही थी। सब कुछ स्थिर… शांत… जैसे यहाँ बरसों से किसी ने आवाज़ न की हो।
लेकिन अजीब बात थी—मेरे भीतर शोर था।
वही पुराना शोर-ओ-गुल।
दोस्तों की हँसी, फुसफुसाहटें, नोट्स माँगने की आवाज़ें, किताबों के पन्नों की सरसराहट… सब जैसे फिर से जीवित हो उठे थे।
मैं धीरे से अंदर आया और आख़िरी बेंच पर बैठ गया।
तभी उस शोर में तुम उभरीं।
जैसे धूप में रखी कोई पुरानी तस्वीर अचानक चमक उठती है, वैसे ही तुम साफ़-साफ़ दिखने लगीं। तुम्हारी हँसी, तुम्हारा सिर झुकाकर बात करना, बालों को कान के पीछे सरकाने की आदत… सब कुछ वैसा ही।
छत पर घूमते पंखे से आती हवा में मुझे तुम्हारे इत्र की वही जानी-पहचानी खुशबू भी महसूस हुई। एक पल को लगा, वक़्त कहीं रुका हुआ है और उसने तुम्हारी मौजूदगी को अब तक सँभाल कर रखा है।
यादों ने जैसे अंगड़ाई ली।
तुम मेरे सामने वाली बेंच पर बैठी थीं। कुछ कह रही थीं। मैं सुन रहा था। मुस्कुरा रहा था। पूरी क्लास फिर से भर गई थी—सिर्फ हमारे लिए।
धीरे-धीरे बाकी सब धुंधला होने लगा।
दीवारें, खिड़कियाँ, दरवाज़ा… सब ओझल।
बस तुम थीं।
और मैं।
दो धड़कनों के बीच का एक छोटा-सा लम्हा।
फिर अचानक पंखे की आवाज़ तेज़ सुनाई दी।
मैंने पलकें झपकाईं।
सब कुछ गायब था।
न तुम…
न वो शोर…
न हँसी।
सिर्फ खाली बेंचें थीं, धूप थी, और एक सन्नाटा।
मैं अकेला बैठा था—एक पुरानी क्लास में, पुरानी यादों के साथ।
तभी समझ आया…
कुछ जगहें कभी खाली नहीं होतीं,
हम ही देर से लौटते हैं।
और सच यही था—
वहाँ कोई नहीं था।
बस मैं… और मेरी यादें। यहीं हकीकत थी।
 
मैं कुछ देर वहीं बैठा रहा।
उन यादों की गरमाहट में अपने हाथ सेंकता हुआ…
जैसे ठंडी सुबह में धूप का छोटा-सा टुकड़ा मिल गया हो।
समय धीरे-धीरे लौट रहा था।
पंखे की आवाज़, खिड़की से आती हवा, बाहर किसी के कदमों की आहट—
सब फिर से सच होने लगा।
मैं उठ खड़ा हुआ।
बेंचों पर एक आख़िरी नज़र डाली,
ब्लैकबोर्ड को देखा,
और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया…
जैसे यहाँ कभी कुछ हुआ ही न हो।
बाहर आकर दरवाज़ा धीरे से बंद कर दिया।
चरमराहट की वही आवाज़ फिर गूँजी—
इस बार कुछ ज़्यादा खाली-सी।
मैं मुड़कर चल दिया।
लेकिन साथ कुछ था…
एक हल्का-सा अहसास—
कि कुछ एहसास कभी मरते नहीं,
वे बस बंद दरवाज़ों के पीछे
चुपचाप साँस लेते रहते हैं।
गलियारे में कदम खुद-ब-खुद धीमे हो गए।
और न जाने क्यों
लबों पर एक पुरानी ग़ज़ल उतर आई।
मैं धीमे-धीमे गुनगुनाने लगा—

            सदियाँ गुज़रीं, तेरी याद भी आई न हमें,
            पर ऐसा भी नहीं कि हम तुम्हें भुला गए।
भुल जाने का हौसला न हुआ,
दूर रहकर भी वो जुदा न हुआ…

और तभी समझ आया—
कुछ रिश्ते साथ चलकर नहीं,
याद बनकर उम्र भर चलते हैं।

 

शनिवार, ७/२/२६ , ०३:४५ PM

अजय सरदेसाई -मेघ


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