प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Thursday, 14 May 2026

वक्त कुछ ऐसे,,,,,,


 

वक़्त कुछ ऐसे बेगुमान हुआ,
मैं अपने आप से अनजान हुआ।।

लोगों की परेशानियों की वजह होती है,
मैं अपने आप से बेवजह ही परेशान हुआ।।

आईनों से नज़र मिलाने का हौसला न रहा,
मेरा अक्स हर वक्त मुझसे बदगुमान हुआ।।

रिश्तों की भीड़ थी मगर तन्हाई कम न हुई,
हर शख़्स अपने मतलब का मेहमान हुआ।।

एक सच ही था जो उम्रभर रोशनी देता रहा,
वरना हर ख्वाब हर मोड़ पर वीरान हुआ।।

हम हँसते रहे महफ़िलों में यूँ ही मगर,
दिल अंदर ही अंदर कितना सुनसान हुआ।।

जिसे अपना समझा वही दूर जाता रहा,
दिल फिर भी उसी शख़्स पर कुर्बान हुआ।।

“मेघ” वक़्त ने अजब फ़न सिखा दिया,
हर दर्द धीरे-धीरे मेरा अरमान हुआ।।

गुरुवार, १४/५/२६ , १२:३५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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