वक़्त कुछ ऐसे बेगुमान हुआ,
मैं अपने आप से अनजान हुआ।।
मैं अपने आप से अनजान हुआ।।
लोगों की परेशानियों की वजह होती है,
मैं अपने आप से बेवजह ही परेशान हुआ।।
आईनों से नज़र मिलाने का हौसला न रहा,
मेरा अक्स हर वक्त मुझसे बदगुमान हुआ।।
रिश्तों की भीड़ थी मगर तन्हाई कम न हुई,
हर शख़्स अपने मतलब का मेहमान हुआ।।
एक सच ही था जो उम्रभर रोशनी देता रहा,
वरना हर ख्वाब हर मोड़ पर वीरान हुआ।।
हम हँसते रहे महफ़िलों में यूँ ही मगर,
दिल अंदर ही अंदर कितना सुनसान हुआ।।
जिसे अपना समझा वही दूर जाता रहा,
दिल फिर भी उसी शख़्स पर कुर्बान हुआ।।
“मेघ” वक़्त ने अजब फ़न सिखा दिया,
हर दर्द धीरे-धीरे मेरा अरमान हुआ।।
गुरुवार, १४/५/२६ , १२:३५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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