प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Sunday, 17 May 2026

वो: एक याद


आज फिर उसी याद से मुलाक़ात रास्ते में हो गई,
उसने पहचानने से ही इनकार कर दिया… आँखें भर आईं।

फिर मैंने ही अपनी पहचान, कॉलेज के दिनों वाली याद दिलाई,
उसकी आँखों में एक झलक-सी उठी… पर होंठ खामोश ही रहे।

बस में सफ़र करते हुए जो मुस्कान कभी उसने दी थी,
ज़िंदगी का वो पन्ना जैसे कब का फट चुका था।

कैंटीन की उस मेज़ पर अब धूल की परतें जम गई हैं,
उन ठहाकों की आवाज़ें वहीं कहीं दफ़न हो गई हैं।

विदा लेते समय हाथ भी एक पल को काँप उठे,
लफ़्ज़ मगर होंठों के पीछे उलझकर रह गए।

भीड़ में भी कुछ पल ठहरकर वक़्त हमें निहारता रहा,
पुराने दिन आँखों में धीरे-धीरे लौट आए — और चले भी गए।

वो मुड़कर चली गई, रास्ता खाली-सा रह गया,
हवा में कई सवाल — अनकहे, अधूरे, बिखरे रह गए।

सोमवार, १८/५/२६ ,८:५५ AM
अजय सरदेसाई — मेघ

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