आज फिर उसी याद से मुलाक़ात रास्ते में हो गई,
उसने पहचानने से ही इनकार कर दिया… आँखें भर आईं।
उसने पहचानने से ही इनकार कर दिया… आँखें भर आईं।
फिर मैंने ही अपनी पहचान, कॉलेज के दिनों वाली याद दिलाई,
उसकी आँखों में एक झलक-सी उठी… पर होंठ खामोश ही रहे।
बस में सफ़र करते हुए जो मुस्कान कभी उसने दी थी,
ज़िंदगी का वो पन्ना जैसे कब का फट चुका था।
कैंटीन की उस मेज़ पर अब धूल की परतें जम गई हैं,
उन ठहाकों की आवाज़ें वहीं कहीं दफ़न हो गई हैं।
विदा लेते समय हाथ भी एक पल को काँप उठे,
लफ़्ज़ मगर होंठों के पीछे उलझकर रह गए।
भीड़ में भी कुछ पल ठहरकर वक़्त हमें निहारता रहा,
पुराने दिन आँखों में धीरे-धीरे लौट आए — और चले भी गए।
वो मुड़कर चली गई, रास्ता खाली-सा रह गया,
हवा में कई सवाल — अनकहे, अधूरे, बिखरे रह गए।
सोमवार, १८/५/२६ ,८:५५ AM
अजय सरदेसाई — मेघ

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