प्रस्तावना

मला कविता करावीशी वाटते , पण जी कविता मला अभिप्रेत आहे , ती कधीच कागदावर अवतरली नाही . ती मनातच उरते , जन्माच्या प्रतीक्षेत ! कारण कधी शब्दच उणे पडतात तर कधी प्रतिभा उणी पडते .म्हणून हा कवितेचा प्रयास सतत करत असतो ...........
तिला जन्म देण्यासाठी , रूप देण्यासाठी ,शरीर देण्यासाठी ......
तिला कल्पनेतून बाहेर पडायचे आहे म्हणून
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Friday, 23 June 2023

सुपर मॅन


 सुपर मॅन

याद है, तुम बहुत छोटे थे। तब तुम्हारी जिज्ञासा बहुत बड़ी हुआ करती थी। तब मैं तुम्हारे लिए सुपरमॅन था। तुम्हारे लिए सूरज भी ला सकता था। तुम्हारे लिए दुनिया में अगर कोई सबसे ताकतवर व्यक्ति था, तो वह शायद मैं ही था।

यह उस जमाने की बात है जब मैं नया-नया पापा बना था। मैं हमेशा जरा डरा हुआ सा रहता था, इसी एक सोच में कि उस दिन मैं क्या करूंगा जब तुम समझ जाओगे कि तुम्हारे पापा कोई सुपरमॅन या ही-मॅन नहीं हैं, जैसे तुम समझते थे। वह तो बस एक आम से शहर के, आम सी नौकरी करने वाले एक बेहद आम इंसान हैं।

इसी डर से मैं बस फिर दिन-रात भागता रहा, काम करता, मेहनत करता रहा, दौड़ता रहा। तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी कर पाऊँ, यही अब मेरी जिंदगी बन चुकी थी। मैं तुम्हारी नज़रों में हमेशा तुम्हारा सुपरमॅन बने रहना चाहता था।

पता ही नहीं चला कि इस दौड़ में जिंदगी कब गुजर गई और कब तुम बड़े हो गए। अब तुम एक गबरू जवान हो गए हो। मेरे लिए तो शायद अब तुम ही सुपरमॅन हो।

मैं अब जरा सा थक-सा गया हूँ। दौड़ने की होड़ अभी भी है, मगर शरीर और मन का तालमेल अब बनता नहीं। रुकना नहीं है मुझे, मैं अब उड़ना चाहता हूँ, लेकिन पंखों में जोर जरा कम-सा है।

आँखें अब दूर तक देख नहीं पातीं, मगर अधूरे कुछ सपने बाकी हैं जिन्हें पूरा करना है। जिंदगी की दौड़-धूप में कुछ अपनी ख्वाहिशें और सपने पीछे छूट गए। सोचता हूँ अब उनके लिए भी थोड़ा वक्त निकालूँ, जो जिंदगी तुम्हारी माँ के साथ जीना बाकी रह गया है, वह भी जी लूँ।

वह जीना, वह सपने पूरी तरह जी न सके हम—वह तेरी माँ का कर्ज है मुझ पर। वह चुकाना है। इसके लिए बेटा, तुम्हारे मजबूत कंधों की बड़ी ज़रूरत होगी।

क्या तुम मेरे सुपरमॅन बनोगे?

शुक्रवार २२/६/२०२३

९:४० PM

अजय सरदेसाई

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