कुची
कुची से दर्द के रंग भरता रहा मैं,
हर लफ़्ज़ में सोज़-ए-दिल उभरता रहा मैं।
सफ़्हे थे ख़ामोश, मगर बोलती थीं रेखाएँ,
भीतर के हर ज़ख़्म को पढता रहा मैं।
कोई न समझा ये तसवीर क्यों नम-सी है,
आँखों से चुपचाप रंग झरता रहा मैं।
दाद क्या मिलती, तसल्ली भी कहाँ थी,
बस अपने ही साए से गुज़रता रहा मैं।
जब-जब भी यादों की हवा तेज़ चली है,
टूटे हुए ख़्वाबों को बिखरता रहा मैं।
आख़िर में ये जाना, ऐ ‘मेघ’, हुनर क्या है—
दिल जलता रहा और निखरता रहा मैं।
बुधवार, ११/२/२६ , १०:३३ PM
अजय सरदेसाई -मेघ
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