गुज़रे हुए लम्हे
गुज़रे हुए लम्हे क्या लौटकर आते हैं,
समझाने से भला किसे समझ आते हैं।
जो पल थे सुहाने, यादों में ही खिलते हैं,
हम उन्हीं के सहारे सफ़र-ए-ज़िंदगी चलते हैं।
जो फूल खिले हैं, कब तक मुस्कुराएँगे,
ख़ुशबू लुटाकर एक दिन मुरझाएँगे।
ख़्वाबों की उम्र भी कितनी ठहर पाती है,
आँख खुलते ही हर तस्वीर बिखर जाती है।
कितना भी थामो इन्हें, ये फिसल जाते हैं,
यही तो जीवन है — सब एक दिन ढल जाते हैं।
बुधवार, ११/२/२६ , ८:३० PM
अजय सरदेसाई -मेघ
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