Tuesday, 16 September 2025

आहिस्ता आहिस्ता



 

ग़म बुंद-बुंद रिसता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

दिल तिल-तिल टूटता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

ख़्वाइशों की जगह टूटे ख़्वाबों ने ली आहिस्ता आहिस्ता।

लम्हा-लम्हा यूँ ही कटता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

रौनक़-ए-गुल मुरझाता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

पत्ता-पत्ता झड़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

रात-ए-बदर से चाँद सिकुड़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

शब-ए-तारीक़ सरकता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

दरिचों पे चिलमन पसरता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

धीरे-धीरे चेहरे पे नक़ाब चढ़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

सब्र-ए-दिल टूटता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

दर्द कतरा-कतरा बढ़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

उम्मीद का चराग़ ढलता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

अँधेरा हौले-हौले बढ़ता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

'मेघ' अश्क बहाता रहा आहिस्ता आहिस्ता।

कतरा-कतरा सागर बनता रहा आहिस्ता आहिस्ता।।

 

मंगलवार, १६/९/२५ ,७:२८ PM

अजय सरदेसाई -मेघ


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