Wednesday, 3 September 2025

ग़ज़ल : पुरी क़ायनात तलाश ली

पूरी क़ायनात तलाश ली, मुझे कोई अकाम न मिला।
मेरे अलावा, मुझे कोई नाकाम न मिला।।

ज़िंदगी मैंने तुझे बे-तहाशा चाहा।
मुझे कोई अच्छा अंजाम न मिला।।

तेरे वादों की झूठी तसल्ली पे यक़ीं भी किया।
मिरे दिल को फिर भी आराम न मिला।।

आशियाँ टूट गया आँधीयों की हवाओं से।
उड़ते मौसम में कोई मुक़ाम न मिला।।

'मेघ' हार गया इश्क़ की जनिब-ए-मंज़िल।
उसको पुकारा दिल से मगर कोई पैगाम न मिला।।

मंगलवार, २/९/२५ , ९:१३ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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