Sunday, 27 July 2025

ग़ज़ल: मजबूरी है


 मतला:

मेरी बेदिली कोई बुज़दिली नहीं है।

ये रवायत नहीं, बस मिरी मजबूरी है।।

 

मुझे आता है मोहब्बत को निभाना।

न निभा पाया, ये मिरी मजबूरी है।।

 

दिल से चाहा था उसे हर एक घड़ी।

अब ये फ़ासला-ए-दिल मिरी मजबूरी है।।

 

किस तरह आँख में अश्क़ों को छुपाएँ।

ये मुस्कुराहट दिल से नहीं, मिरी मजबूरी है।।

 

मक़्ता :

 

जिसे दिल से कभी अपना कहा था ‘मेघ’।

अब उसी को अजनबी कहूँ, मिरी मजबूरी है।।

 

रविवार २७/७/२५ .३:२० PM

अजय सरदेसाई =मेघ

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