Sunday, 27 July 2025

ग़ज़ल: शरारे उभरे


मतला:

ज़ेहन की ख़ामोश सतह पर ये कैसे बुलबुले उभरे।

दिल के कोनों से जैसे कई अनचाहे ख़याल उभरे।।

 

यादों के बंद दरवाज़े खुल गए अचानक।

अतीत की वीरानियों से न जाने कौन से सवाल उभरे।।

 

ख़ामोशी की चादर में दफ़्न थी जो सदियाँ।

उन लम्हों के साए से कुछ दर्द के मंज़र उभरे।।

 

चाहा था रूह ने कि सुकून की नेमत पाए।

मगर तन्हाई में चुपके से ग़म के हवाले उभरे।।

 

वक़्त की ठंडी हवाओं से जब भूली हुई यादें बिखरीं।

यादों की राखों तले कुछ तपते शरारे उभरे।।

 

मक़्ता:

‘मेघ’ वो जो दबे थे सदियों से दिल की गहराइयों में।

आज क्यों तिरे नाम से वो अनकहे जज़्बात उभरे।।

 

रविवार, २७/७/२५ ,४:४० PM

अजय सरदेसाई -मेघ


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